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Flash Back : हार से बचाने के लिए एनटी रामाराव ने आंध्र प्रदेश में बहुगुणा के लिए खाली कराई थी सीट

Wed, 03 Apr 2024 02:35 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 03 Apr 2024 02:35 PM IST
सार

1989 के चुनाव में इलाहाबाद सीट के समीकरणों को लेकर चली उठा-पटक अब भी लोगों को अच्छी तरह याद है। तब विपक्ष के नेता चाहते थे कि बहुगुणा जैसे नेता को कहीं न कहीं से जिताकर संसद में भेजा जाना चाहिए। उस चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के पक्ष में सहानुभूति की लहर चल रही था।

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To save from defeat, NT Rama Rao had vacated the seat for Bahuguna in Andhra Pradesh.
हेमवती नंदन बहुगुणा। फाइल फोटो - फोटो : सोशल मीडिया।

विस्तार

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के लोकसभा चुनाव में सहानुभूति की लहर में अमिताभ बच्चन के मुकाबले दिग्गज नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा को हार से बचाने की पटकथा लिखी गई थी। तब तय किया गया था कि इलाहाबाद से बहुगुणा की हार होती भी है तो उन्हें दक्षिण की किसी सीट से जिताकर संसद भेज दिया जाएगा। इसके लिए तेलुगुदेशम पार्टी के नेता एनटी रामाराव ने आंध्रप्रदेश की एक सीट भी खाली कराई, लेकिन वह अपने काम और लोकप्रियता को लेकर इतने आश्वस्त थे कि वहां गए ही नहीं और चुनाव हार गए।

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1989 के चुनाव में इलाहाबाद सीट के समीकरणों को लेकर चली उठा-पटक अब भी लोगों को अच्छी तरह याद है। तब विपक्ष के नेता चाहते थे कि बहुगुणा जैसे नेता को कहीं न कहीं से जिताकर संसद में भेजा जाना चाहिए। उस चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के पक्ष में सहानुभूति की लहर चल रही था। कांग्रेस की ओर से उम्मीदवारों के नाम का एलान होना था। बहुगुणा के आवास पर बड़े नेता चुनावी गोटियां बिछा रहे थे।
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अचानक बहुगुणा के कक्ष में फोन की घंटी बजने लगी। फोन उठाने के बाद बहुगुणा का चेहरा उतर गया था। समर्थकों को काफी कुरेदने के बाद उन्होंने बताया कि कांग्रेस ने उनके खिलाफ अमिताभ बच्चन को उतार दिया है। फिर जीत का गणित लगाया जाने लगा। वहां लोगों का कहना था कि बहुगुणा मुसलमानों के सबसे बड़े नेता हैं।

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मुसमानों के पसंदीदा नेता थे बहुगुणा

चाहे नवाब हों या आम मुसलमान, सभी उनके मुरीद रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू के बाद यूपी का मुसलमान किसी को अपना नेता समझता था तो वह हेमवती नंदन बहुगुणा थे। मुजप्फरनगर से लेकर गोरखपुर तक मुसलमानों के अकेले नेता थे। उनको उर्दू बोलने का शौक था और अक्सर अपने भाषणों में शेरो-शायरी किया करते थे, जिसे मुसलमान बेहद पसंद करते थे।

हालांकि, उनके आलोचक कहा करते थे कि वह अपने उर्दू भाषण देवनागरी में लिखवा कर उन्हें रट लिया करते थे। आजकल के राजनीतिक इफ्तारों से कहीं पहले बहुगुणा ने इफ्तार पार्टियां देनी शुरू कर दी थीं। कई बार किसी पब्लिक मीटिंग के दौरान अजान की आवाज सुनाई देने पर वह बोलना बंद कर देते थे। ईद के दिन उन्हें ईदगाह के बाहर मुसलमानों से गले मिलते देखा जाता था। ये चीज़ें उन्हें मुसलमानों से जोड़ती थी, लेकिन उनके आलोचक इसे ''स्टंट'' की संज्ञा देते थे। इन सबको लेकर माना जा रहा था कि अमिताभ बच्चन के आने के बाद भी बहुत असर नहीं पड़ेगा।

तेलुगुदेशम पार्टी से चुनाव लड़ने का था ऑफर
 

मुसलमान बहुगुणा को वोट करेंगे। उस चुनाव की कवरेज करने वाले पत्रकार स्नेह मधुर बताते हैं कि बाद में तेजी से प्रचारित होने लगा कि बहुगुणा अमिताभ बच्चन के मुकाबले चुनाव हार सकते हैं। यह बात ऊपर तक पहुंचने लगी और उनके करीबी कई नेता इसे लेकर मंथन करने लगे थे। स्नेह मधुर बताते हैं कि बहुगुणा के आवास पर बैठक हो रही थी। पत्रकारों का जमावड़ा लगा था। उसी समय फोन की घंटी बजने लगी।


बहुगुणा की को कुछ लोगों ने फोन सुन लेने की सलाह दी। वह उठकर अपने कक्ष में गए और कुछ देर बाद खमोशी ओढ़े लौटे। उनसे जब पूछा जाने लगा कि किसका फोन था और बात क्या हुई? तब उनका कहना था कि एनटी रामाराम ने फोन पर संदेश दिया है कि हैदराबाद आ जाओ, वहां से भी नामांकन कर दो। तेलुगुदेशम के समर्थन से जीत जाओगे। लेकिन, एनटी रामाराव की बात धरी रह गई। बहुगुणा हैदराबाद से लड़ने नहीं गए और अंतत: उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।

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