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फिर बदला अतीक का ठिकाना

Sun, 11 Dec 2016 01:56 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sun, 11 Dec 2016 01:56 AM IST
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Then change the locus of Atiq
बिना नंबर प्लेटी की कार से आए थे बदमाश - फोटो : फाइल फोटो
समाजवादी पार्टी ने बाहुबली नेता अतीक  अहमद का ठिकाना एक बार फिर बदल दिया है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा ने उन्हें सुल्तानपुर से उम्मीदवार बनाया था लेकिन वहां अतीक पराजित हो गए। इस बार विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी ने उन्हें कानपुर कैंट से टिकट दिया है। पार्टी के इस निर्णय को कहीं न कहीं शहर पश्चिमी को अतीक फैक्टर से मुक्त कराना माना जा रहा है, क्योंकि यहां से लगातार दो बार से बसपा की पूजा पाल विधायक हैं। माना जा रहा है कि  सपा अतीक को कानपुर भेजकर शहर पश्चिमी में अपने प्रत्याशी की स्थिति मजबूत करना चाहती है।
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अतीक अहमद शहर पश्चिमी विधानसभा से वर्ष 1991 से 2002 तक लगातार विधायक रहे। पहली बार 1991 में वह निर्दलीय के रूप में मैदान में उतरे और जीत दर्ज की। वर्ष 1993 में दोबारा हुए चुनाव में भी अतीक ने निर्दलीय के रूप में बाजी मारी। इसके तीन वर्ष बाद 1996 में फिर से चुनाव हुए। इसमें अतीक ने अपना दल के प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की। इसके बाद अतीक ने समाजवादी पार्टी का दामन थामा। वर्ष 2002 में अतीक सपा के टिकट पर पश्चिमी से जीते। इसके बाद वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में अतीक विधायकी छोड़कर संसद में जाने की जुगत में लग गए।
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फिर सपा में उनका सिक्का ऐसा चला कि फूलपुर से सांसद रहे धर्मराज सिंह पटेल का टिकट काटकर उन्हें उम्मीदवार बना दिया गया। अतीक फूलपुर संसदीय सीट से जीत दर्ज करके लोकसभा भी पहुंच गए। अतीक के लोकसभा में जाने के बाद शहर पश्चिमी में उप चुनाव हुआ, जिसमें अतीक के छोटे भाई खालिद अजीम अशरफ को सपा ने मैदान में उतारा पर बाजी मारी बसपा के राजू पाल ने, लेकिन 25 जनवरी 2005 को राजू पाल की हत्या हो गई और इस घटना में अतीक का पूरा परिवार फंस गया। राजू पाल की हत्या के बाद पश्चिमी में फिर चुनाव हुआ, जिसमें सपा के टिकट पर अशरफ ने जीत दर्ज की। 
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इसके बाद वर्ष 2007 में आम चुनाव हुए। इसमें बसपा ने राजू पाल की पत्नी पूजा पाल को मैदान में उतारा लेकिन इस बार अतीक, अशरफ की हनक नहीं चली और बाजी पूजा पाल ने मार ली वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भी पूजा ने सपा प्रत्याशी ज्योति यादव को पराजित किया। इस हार के लिए कहीं न कहीं अतीक फैक्टर को ही जिम्मेदार माना गया। अब माना जा रहा है कि पार्टी ने अतीक को कानपुर कैंट भेजकर एक तीर से दो निशाने लगाए हैं। एक तो यह कि शहर पश्चिमी को अतीक फैक्टर से मुक्त कराना, जिसकी वजह से पूजा पाल दो बार से जीत रही हैं, दूसरे अतीक के बाहर जाने से अपने प्रत्याशी की स्थिति मजबूत करना। पार्टी इस रणनीति में कितना सफल होगी यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
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