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अपना ‘घर’ बनाने को उजाड़ रहे उनका ‘घरौंदा’
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Mon, 05 Oct 2015 02:02 AM IST
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इलाहाबाद। आज शहर में जिस ओर भी नजर दौड़ाएं वहां ऊंची-ऊंची मल्टी स्टोरी इमारतें, उन पर लगे मोबाइल टॉवर, चौड़ी-चौड़ी सड़कें तो दिखेंगी लेकिन इन सबके बीच घरों, मोहल्लों में गौरेया, बुलबुल, कौओं का दिखना गुम हो गया है। फूलों पर तितलियों, मधुमक्खियों का मंडराना भी कम हुआ है। दरअसल अपना आशियाना बनाने के फेर में हमने जहां पशुओं के जंगल-मैदान पर कब्जा जमा लिया, वहीं परिदों के घरौंदे भी उजाड़ दिए। पशु-पक्षियों, पौधों और हरियाली का होना हमारे होने की शर्त है। खुद की सुख सुविधाओं की चाहत में ऐसे मशगूल हैं कि उनके अस्तित्व को भी दरकिनार कर बैठे, जिनसे हमारा अस्तित्व जुड़ा है।
बीते पांच वर्षों में शहरी क्षेत्र में तकरीबन दस प्रतिशत का विस्तार हुआ है। यहां लगातार बिल्डिंग्स बनती जा रहीं और और बाजार का विस्तार हुआ। फाफामऊ के आगे शांतिपुरम तक शहरी क्षेत्र था, जो अब बढ़कर नवाबगंज तक हो गया है। झूंसी का दायरा सराय इनायत से बढ़कर हनुमानगंज तौ बमरौली के कदम पोंगहट से आगे सैयद सरावां और नैनी का विस्तार आईटीआई से काफी आगे करछना तक हो गया है। इसी तरह 10-12 वर्ष पहले जहां तकरीबन 40 तालाब थे, आज उनकी संख्या 10-12 तक सिमटकर रह गई है। तालाबों को पाटकर बड़ी-बड़ी हॉउसिंग स्कीम बना दी गई है। शहरी सीमा बढ़ने से हरियाली भी कम हुई है। महाकुंभ में सडत़कों के चौड़ीकरण और सुंदरीकरण के नाम पर तकरीबन चार सौ पेड़ काटे गए तो बताने की जरूरत नहीं कि कितने परिंदों का घरौंदा गुम हो गया। एक के बदले तीन पौधे लगाने का लक्ष्य सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह गया है।
इसी तरह यमुनापार क्षेत्र में काले हिरन ‘ब्लैक बक’ पाए जाते हैं, जो दुर्लभ वन्य जीवों में शुमार हैं, मगर इनके संरक्षण की ओर से भी सरकार का कोई खास ध्यान नहीं है। इनके प्राकृतिक पर्यावास पर संकट मंडरा रहा है। घास के मैदान के साथ जलक्षेत्र भी कम हुआ है। इको-टूूरिज्म के तहत इनके संरक्षण के लिए प्रदेश सरकार को रिपोर्ट भी भेजी गई है, मगर पांच वर्षों से रिपोर्ट अटकी हुई है। एनटीपीसी की ओर से इस बारे में पहल हुई है लेकिन नाकाफी है। संगम किनारे पांच किलोमीटर के एरिया में नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत छायादार वृक्षों को लगाए जाने की योजना है, मगर यह भी अब तक बहुत आगे नहीं बढ़ सकी है।
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वैज्ञानिकों की मानें तो पक्षियों और तितलियों की कमी से खेती पर असर पड़ रहा है। प्राकृतिक तरीके से परागण ले जाने की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। वनस्पतियों का स्थानांतरण थम सा गया है। जैविक संपदा को विस्तार नहीं मिल पा रहा है और कृत्रिम विधियों से इसकी भरपाई संभव नहीं है। प्राकृतिक आवास न मिलने से गिद्ध के साथ ही गौरेया, कौआ, तोता, मैना, बुलबुल, सारस, तितलियां, मधुमक्खियां विलुप्त जीवों की श्रेणी में आ गई हैं। कृषि योग्य भूमि सिमटती जा रही है, तो तालाब और पानी के अन्य स्त्रोत भी कम हुए हैं।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ इंवायरमेंटल एंड संस्टेनबल डेवलेपमेंट के निदेशक डॉ. अखिलेश रघुवंशी का कहना है कि तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण और घरौंदों के साथ गुम होते पशु-पक्षियों की वजह से प्राकृतिक श्रृंखला टूटती जा रही है। इसका सीधा असर इनकी प्रजनन क्षमता पर भी पड़ रहा है। यह प्राकृतिक संतुलन के लिए भी बहुत बड़ा संकट है। हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपना घर बनाने के लिए पशु पक्षियों को बेघर न करें।
जिले में 21 हजार हेक्टेयर वनक्षेत्र हैं। वन विभाग की ओर से ब्लैक बग के संरक्षण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। हां, यह सही है कि सुंदरीकरण के नाम पर जो पेड़ काटे गए हैं, उसकी एवज में लगाए गए पौधों को उस स्थिति में पहुंचने में लंबा वक्त लगेगा।
मनोज खरे
प्रभागीय वनाधिकारी, इलाहाबाद
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बीते पांच वर्षों में शहरी क्षेत्र में तकरीबन दस प्रतिशत का विस्तार हुआ है। यहां लगातार बिल्डिंग्स बनती जा रहीं और और बाजार का विस्तार हुआ। फाफामऊ के आगे शांतिपुरम तक शहरी क्षेत्र था, जो अब बढ़कर नवाबगंज तक हो गया है। झूंसी का दायरा सराय इनायत से बढ़कर हनुमानगंज तौ बमरौली के कदम पोंगहट से आगे सैयद सरावां और नैनी का विस्तार आईटीआई से काफी आगे करछना तक हो गया है। इसी तरह 10-12 वर्ष पहले जहां तकरीबन 40 तालाब थे, आज उनकी संख्या 10-12 तक सिमटकर रह गई है। तालाबों को पाटकर बड़ी-बड़ी हॉउसिंग स्कीम बना दी गई है। शहरी सीमा बढ़ने से हरियाली भी कम हुई है। महाकुंभ में सडत़कों के चौड़ीकरण और सुंदरीकरण के नाम पर तकरीबन चार सौ पेड़ काटे गए तो बताने की जरूरत नहीं कि कितने परिंदों का घरौंदा गुम हो गया। एक के बदले तीन पौधे लगाने का लक्ष्य सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह गया है।
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इसी तरह यमुनापार क्षेत्र में काले हिरन ‘ब्लैक बक’ पाए जाते हैं, जो दुर्लभ वन्य जीवों में शुमार हैं, मगर इनके संरक्षण की ओर से भी सरकार का कोई खास ध्यान नहीं है। इनके प्राकृतिक पर्यावास पर संकट मंडरा रहा है। घास के मैदान के साथ जलक्षेत्र भी कम हुआ है। इको-टूूरिज्म के तहत इनके संरक्षण के लिए प्रदेश सरकार को रिपोर्ट भी भेजी गई है, मगर पांच वर्षों से रिपोर्ट अटकी हुई है। एनटीपीसी की ओर से इस बारे में पहल हुई है लेकिन नाकाफी है। संगम किनारे पांच किलोमीटर के एरिया में नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत छायादार वृक्षों को लगाए जाने की योजना है, मगर यह भी अब तक बहुत आगे नहीं बढ़ सकी है।
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वैज्ञानिकों की मानें तो पक्षियों और तितलियों की कमी से खेती पर असर पड़ रहा है। प्राकृतिक तरीके से परागण ले जाने की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। वनस्पतियों का स्थानांतरण थम सा गया है। जैविक संपदा को विस्तार नहीं मिल पा रहा है और कृत्रिम विधियों से इसकी भरपाई संभव नहीं है। प्राकृतिक आवास न मिलने से गिद्ध के साथ ही गौरेया, कौआ, तोता, मैना, बुलबुल, सारस, तितलियां, मधुमक्खियां विलुप्त जीवों की श्रेणी में आ गई हैं। कृषि योग्य भूमि सिमटती जा रही है, तो तालाब और पानी के अन्य स्त्रोत भी कम हुए हैं।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ इंवायरमेंटल एंड संस्टेनबल डेवलेपमेंट के निदेशक डॉ. अखिलेश रघुवंशी का कहना है कि तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण और घरौंदों के साथ गुम होते पशु-पक्षियों की वजह से प्राकृतिक श्रृंखला टूटती जा रही है। इसका सीधा असर इनकी प्रजनन क्षमता पर भी पड़ रहा है। यह प्राकृतिक संतुलन के लिए भी बहुत बड़ा संकट है। हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपना घर बनाने के लिए पशु पक्षियों को बेघर न करें।
जिले में 21 हजार हेक्टेयर वनक्षेत्र हैं। वन विभाग की ओर से ब्लैक बग के संरक्षण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। हां, यह सही है कि सुंदरीकरण के नाम पर जो पेड़ काटे गए हैं, उसकी एवज में लगाए गए पौधों को उस स्थिति में पहुंचने में लंबा वक्त लगेगा।
मनोज खरे
प्रभागीय वनाधिकारी, इलाहाबाद