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पीठ के दूसरे जज ने वासुदेवानंद को माना संन्यासी

Sat, 23 Sep 2017 01:53 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sat, 23 Sep 2017 01:53 AM IST
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The second judge of the bench, believed to be Vasudevananda
शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती महाराज
ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य के पद पर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद की नियुक्ति को अवैधानिक करार देने वाले फैसले पर खंडपीठ के दोनों जज एक मत हैं। मगर स्वामी वासुदेवानंद को संन्यासी नहीं मानने पर एक जज (जस्टिस केजे ठाकर) ने मतभिन्नता जाहिर की है। इस मुद्दे पर अपनी असहमति जताते हुए कहा कि वासुदेवानंद भले ही शुरू से संन्यासी न रहे हों मगर 1989 के बाद उन्होंने अपना सबकुछ त्याग दिया और संन्यासी का जीवन ही जी रहे हैं। उन्होंने दशनामी ओढ़ ली और गुरु-शिष्य परंपरा का पालन कर रहे हैं। पीठ पर रहते हुए वह लगातार गुरु-शिष्य परंपरा का पालन करते आ रहे हैं और यहां तक की शंकराचार्य पद पर उनकी नियुक्ति भी गुरु-शिष्य परंपरा के आधार पर ही की गई। यह परंपरा स्वामी ब्रहनंद सरस्वती से लेकर स्वामी शांतानंद सरस्वती, स्वामी शांतानंद से स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती और स्वामी विष्णुदेवानंद से स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती तक चली आ रही है।
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जस्टिस ठाकर ने अपने फैसले में कहा है कि यह मुकदमा सुप्रीमकोर्ट तक गया और स्वामी शांतानंद सरस्वती कभी भी पदच्युत नहीं किए गए। उन्होंने कहा कि स्वामी वासुदेवानंद शंकराचार्य के पद की सभी योग्यताएं रखते हैं वह सभी धार्मिक और शैक्षणिक योग्यताएं रखते हैं। इसलिए कोर्ट के आदेश का बिंदु संख्या 12 जो उनके विरुद्ध निर्णीत किया गया है, मेरे द्वारा उनके पक्ष में निर्णीत किया जाता है। स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती संन्यासी हैं।
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जस्टिस ठाकर ने एक बिंदु पर भिन्न मत रखने के बावजूद शेष पूरे निर्णय पर अपनी सहमति जताई है। उन्होंने कहा कि मैं फैसले के निष्कर्ष से सहमत हूं इसलिए मेरी समझ में इस मामले को तीसरे जज के समक्ष भेजने की आवश्यकता नहीं है।
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जस्टिस ठाकर ने अपने निर्णय की शुरूआत में पीठ के वरिष्ठ जज जस्टिस सुधीर अग्रवाल द्वारा इस विस्तृत निर्णय को तैयार करने में की गई दिन रात की मेहनत की प्रशंसा की है। उन्होंने कहा कि कई दिन और रातें जागकर हजारों पेज के दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद उन्होंने निर्णय लिखाया है।

ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य पद को लेकर हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा दिया गया निर्णय कई दृष्टि से ऐतिहासिक है। इसके कुल सात खंड तैयार किए गए हैं, जिसमें कुल करीब 800 पेज हैं। फैसले में सन्यास पद्धति, शंकराचार्य पीठों की स्थिति सहित सनातन धर्म की तमाम मान्यताओं पर विस्तृत विवेचना की गई है।

धर्म के नाम पर देश भर में फैले कारोबार पर कटाक्ष करते हुए हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से कहा है कि केंद्र और राज्य की सरकार धर्म के इन ठेकेदारों से आम जनता की रक्षा करने के लिए कड़े कदम उठाए। सरकार इसके लिए आवश्यक नियम-कानून बनाए । कोर्ट ने विश्वास व्यक्त किया है कि सरकार जल्दी ही धार्मिक संस्थाओं को नियमित तथा संचालित करने और मुकदमेबाजी रोकने के लिए कदम उठाएगी। ताकि आम लोगों को धोखेबाजी और ठगे जाने से बचाया जा सके।

जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस केजे ठाकर की पीठ ने कहा कि हम न्यायिक रूप से इस बात का संज्ञान लेते हैं कि आम आदमी की धर्म में गहरी आस्था है और इसी वजह से लोगों धार्मिक संस्थाओं को दान करते हैं। जनता के इस दान की बदौलत धार्मिक संस्थाओं की चल और अचल संपत्ति में गुणात्मक वृद्धि हो रही है। कई मंदिरों और मठों की संपत्ति केंद्र सरकार के वार्षिक बजट के बराबर या किसी राज्य के वार्षिक बजट से भी अधिक है। इस अकूत संपत्ति की बदौलत ही इन संस्थाओं में विवाद तथा मुकदमेबाजी बढ़ी है। बहुत से मामलों में धोखेबाज और ठग किस्म के लोगों ने अपनी धार्मिक संस्थाएं खोलकर पीठाधीश्वर, जगतगुरु शंकराचार्य, मठाधिपति जैसी बड़ी-बड़ी पदवियां धारण कर ली है और भोलीभाली धर्मभीरु जनता को लूट रहे हैं।


खंडपीठ ने इस विस्तृत फैसले को तैयार करने में सहयोग करने वाले अधिवक्ताओं और अपने स्टॉफ का आभार जताया है। हजारों पन्नों के रिकार्ड और न्यायिक निर्णयों को अदालत को उपलब्ध कराने में अधिवक्ता मनीष गोयल, परमेश्वरनाथ मिश्र, वरिष्ठ अधिवक्ता शशिनंदन, वजाहत हुसैन खान और अनूप त्रिवेदी के अलावा कोर्ट मास्टर प्रदीप कुमार जायसवाल , सुशील कुमार , पवन कुमार चौरसिया प्राइवेट सिक्रेटरी अखिलेश कुमार नायक, अवधेश कुमार, पुनीत श्रीवास्तव, प्रवीन वर्मा और शुभम अग्रहरि की कोर्ट ने प्रशंसा की है। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि स्वयं उनको फैसला लिखाने के लिए दो सप्ताह का अवकाश लेना पड़ा तथा महीनों की दिनरात की मेहनत के बाद निर्णय तैयार हो सका।
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