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मां का संकल्प पूरा करने आए बेटे
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
Updated Thu, 29 Jan 2015 11:35 PM IST
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गोरखपुर की कलावती ने संगम पर 11 वर्ष कल्पवास किया, सोचा था कि 12 वें वर्ष शैयादान करेंगी, लेकिन वह नहीं रहीं। मां के संकल्प का कल्पवास अधूरा न रह जाए, इसलिए अबकी माघ मेले में उनके बेटे दुर्गेश त्रिपाठी ने बृहस्पतिवार को विधि-विधान से शैयादान के संकल्प को पूरा किया। इसी तरह गोमती नगर लखनऊ के डीडी मिश्रा की मां के शैयादान के संकल्प को नौ वर्ष बाद उनके बेटे ने आकर मां के संकल्प को पूरा किया।
संगम पर कल्पवास के दौरान जप-तप, पूजा पाठ, यम-नियम से माह भर अनुशासित जीवन गुजारने के बाद यज्ञ और भंडारे से जहां अनुष्ठान को पूर्णता मिलती हैं वहीं कल्पवासी विदा से पहले तीर्थ पुरोहितों को शैया दान सहित यथोचित दान करना नहीं भूलते। मगर कई कल्पवासी ऐसे भी रहे जिनकी अपने जीवनकाल में शैयादान की आस अधूरी रह गई जिसे उनके परिजन पूरा करते हैं ताकि कल्पवासी को कल्पवास का पूरा पुण्य मिल सके।
तीर्थ पुरोहित राजाराम पांडेय कहते हैं, मां के संकल्प को पूरा करने के लिए उनके बेटों ने आकर शैयादान किया। दरअसल शैयादान इस कामना के साथ किया जाता है कि अगले जन्म में उसे वैसी ही पूर्णता प्राप्त हो। परंपरा के मुताबिक तीन, पांच, सात, नौ या बारह वर्ष, कभी भी शैयादान किया जा सकता है। कल्पवासी अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार शैयादान करते हैं। तीर्थ पुरोहित अनिल कहते हैं, शैयादान श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। इसमें पलंग, वाहन, सोने चांदी के आभूषण, कपड़े सहित गृहस्थी और राशन का सामान शामिल है।
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संगम पर कल्पवास के दौरान जप-तप, पूजा पाठ, यम-नियम से माह भर अनुशासित जीवन गुजारने के बाद यज्ञ और भंडारे से जहां अनुष्ठान को पूर्णता मिलती हैं वहीं कल्पवासी विदा से पहले तीर्थ पुरोहितों को शैया दान सहित यथोचित दान करना नहीं भूलते। मगर कई कल्पवासी ऐसे भी रहे जिनकी अपने जीवनकाल में शैयादान की आस अधूरी रह गई जिसे उनके परिजन पूरा करते हैं ताकि कल्पवासी को कल्पवास का पूरा पुण्य मिल सके।
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तीर्थ पुरोहित राजाराम पांडेय कहते हैं, मां के संकल्प को पूरा करने के लिए उनके बेटों ने आकर शैयादान किया। दरअसल शैयादान इस कामना के साथ किया जाता है कि अगले जन्म में उसे वैसी ही पूर्णता प्राप्त हो। परंपरा के मुताबिक तीन, पांच, सात, नौ या बारह वर्ष, कभी भी शैयादान किया जा सकता है। कल्पवासी अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार शैयादान करते हैं। तीर्थ पुरोहित अनिल कहते हैं, शैयादान श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। इसमें पलंग, वाहन, सोने चांदी के आभूषण, कपड़े सहित गृहस्थी और राशन का सामान शामिल है।
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