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High Court : सास पर स्त्रीधन न लौटाने का आरोप, कोर्ट ने कहा-सच्चाई ट्रायल में होगी तय

Mon, 01 Jun 2026 07:47 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 01 Jun 2026 07:47 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न, स्त्रीधन हड़पने के आरोपों से जुड़े मामलों में पति और सास को राहत देने से इन्कार कर दिया है। कहा कि सास के खिलाफ स्त्रीधन वापस न करने और अन्य गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनकी सत्यता का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।

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The court said that the mother-in-law was accused of not returning the dowry, and the truth would be determine
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न, स्त्रीधन हड़पने के आरोपों से जुड़े मामलों में पति और सास को राहत देने से इन्कार कर दिया है। कहा कि सास के खिलाफ स्त्रीधन वापस न करने और अन्य गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनकी सत्यता का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।

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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने मुकदमे की पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग में दायर याचिका खारिज कर दी। गाजियाबाद के टीला मोड़ थाने में याची गीता और अन्य के खिलाफ दहेज प्रताड़ना व अन्य आरोप में प्राथमिकी दर्ज है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि दो फरवरी 2012 को विवाह के बाद से ही उसे अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया। उसके साथ मारपीट की गई, मानसिक उत्पीड़न किया गया और उसका स्त्रीधन वापस नहीं किया गया।
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महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उसे घर से निकाल दिया गया और धमकी दी गई। पति और उसकी मां ने मुकदमे की कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। याची के अधिवक्ता ने दलील दी गई कि प्राथमिकी झूठी और दुर्भावनापूर्ण है। महिला अपनी इच्छा से घर छोड़कर गई थी। यह मुकदमा प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराया गया है।
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हालांकि, राज्य सरकार और शिकायतकर्ता पक्ष ने याचिका का विरोध किया। कहा कि प्राथमिकी में संज्ञेय अपराधों का स्पष्ट उल्लेख है। जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री भी आरोपों का समर्थन करती है।


कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा-482 के तहत निहित शक्तियों का प्रयोग करते समय अदालत का कार्य साक्ष्यों का मूल्यांकन करना या ‘मिनी ट्रायल’ करना नहीं है। यदि प्राथमिकी और उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया अपराध का संकेत देती है तो कार्यवाही को इस स्तर पर रद्द नहीं किया जा सकता। 

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