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‘बुआ’ के आशीर्वाद ने तोड़ा अतीक का ‘चक्रव्यूह’
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Thu, 15 Mar 2018 01:29 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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सियासी जमीन पर भाजपा के सरपट दौड़ते घोड़े को रोकने के लिए बसपा सुप्रीमों मायावती का सपा उम्मीदवार को समर्थन का दांव सफल रहा। बसपा के भीमराव अंबेडकर राज्यसभा में पहुंचेंगे या नहीं यह तो चुनाव का नतीजा बताएगा लेकिन दूरगामी परिणाम वाला ‘बुआ-बबुआ’ का यह गठजोड़ अतीक रूपी ‘चक्रव्यूह’ को भी तोड़ने में सफल रहा। बसपा का कैडर वोट नागेंद्र के खाते में तो गया ही, बसपा के समर्थन से पहले तक मुख्य दावेदारों में शामिल रहे पूर्व सांसद अतीक को मात्र 48096 मतों तक समेटने में भी सफल रहा। समर्थन के बाद अचानक बदले समीकरण से बसपा के कैडर वोट के साथ मुस्लिमों का ध्रुवीकरण सपा के पक्ष में हुआ, जो निर्णायक साबित हुआ।
2014 में भाजपा के केशव ने फूलपुर लोकसभा के पांचों विधानसभा में बड़ी बढ़त बना रखी थी। पिछले साल हुए विधानसभा में भी भाजपा पांचों सीट जीतने में सफल रही। इसके अलावा यह क्षेत्र उप मुख्यमंत्री का है। इस सियासी समीकरण के बीच पटेलों को जोड़ने के लिए भाजपा ने कौशलेंद्र पटेल को उम्मीदवार बनाया तो अतीक अहमद के मैदान में आ जाने से मुस्लिम मतों के विखराव की भी पूरी आशंका रही। ऐसे में भाजपा की एक बार फिर जीत पक्की मानी जा रही थी लेकिन चार मार्च को मायावती ने सपा उम्मीदवार के समर्थन की घोषणा कर दी। इसके बाद क्षेत्र के सारे समीकरण तेजी से बदले और सपा के शीर्ष नेताओं ने यहां डेरा डाल लिया। इसके अलावा कैडर मतों को घरों से निकालने के लिए सपा की सभाओं में बसपा के झंडे लगाने के साथ पार्टी के नेताओं को मंच पर लाया गया। साथ में सपा यह संदेश देने में सफल रही कि भाजपा के खिलाफ सपा जीत की स्थिति में है और अतीक भाजपा की रणनीति का हिस्सा हैं। प्रचार के आखिरी दिन सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के रोड शो और सभा ने इस समीकरण को और मजबूत किया और दो चुनावों के बाद फूलपुर में सपा की साइकिल एक बार फिर निकल पड़ी।
0 कम मतदान - मतदानों के प्रति लोगों की बेरुखी भाजपा भारी पड़ी। अब तक के सबसे कम मात्र 37.13 फीसदी मतदान के बाद ही भाजपा की हार की अटकलें लगने लगी थीं। भाजपा अपने गढ़ शहर उत्तरी एवं पश्चिमी में ही मतदाताओं को नहीं निकाल पाया।
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0 सपा और बसपा का एक होना- चुनाव के आखिरी दिनों में बसपा के समर्थन ने सपा उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनाया और पार्टी का कैडर वोट नागेंद्र के पक्ष में गया।
0 अतीक के खतरे को भांपने में रही सफल- सपा के रणनीतिकार अतीक अहमद के खतरे को भांपने में सफल रहे। पूरे चुनाव के दौरान भाजपा के साथ सपा की सीधी टक्कर बताने के साथ अतीक को भाजपा की रणनीति का हिस्सा बताने की कोशिश हुई जो सफल रही।
0 भाजपा के वोटरों की बेरुखी - भाजपा के भीतर ही नेताओं और कार्यकर्ताओं की न सुने जाने की शिकायत लंबे समय से है। पार्टी का भीतरघात कई बार बाहर भी दिखा। इसके अलावा आम मतदाताओं में भी नाराजगी रही तथा वे घरों से नहीं निकले।
0 जातीय समीकरण साधने में कामयाब - सपा जातीय समीकरण को साधने में सफल रही। स्थानीयता को हवा देकर पार्टी पटेलों को जोड़ने में रही तो यादवों तथा अन्य पिछड़ी जातियों के साथ बसपा के कैडर मतों ने जीत की आधार रखी।
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2014 में भाजपा के केशव ने फूलपुर लोकसभा के पांचों विधानसभा में बड़ी बढ़त बना रखी थी। पिछले साल हुए विधानसभा में भी भाजपा पांचों सीट जीतने में सफल रही। इसके अलावा यह क्षेत्र उप मुख्यमंत्री का है। इस सियासी समीकरण के बीच पटेलों को जोड़ने के लिए भाजपा ने कौशलेंद्र पटेल को उम्मीदवार बनाया तो अतीक अहमद के मैदान में आ जाने से मुस्लिम मतों के विखराव की भी पूरी आशंका रही। ऐसे में भाजपा की एक बार फिर जीत पक्की मानी जा रही थी लेकिन चार मार्च को मायावती ने सपा उम्मीदवार के समर्थन की घोषणा कर दी। इसके बाद क्षेत्र के सारे समीकरण तेजी से बदले और सपा के शीर्ष नेताओं ने यहां डेरा डाल लिया। इसके अलावा कैडर मतों को घरों से निकालने के लिए सपा की सभाओं में बसपा के झंडे लगाने के साथ पार्टी के नेताओं को मंच पर लाया गया। साथ में सपा यह संदेश देने में सफल रही कि भाजपा के खिलाफ सपा जीत की स्थिति में है और अतीक भाजपा की रणनीति का हिस्सा हैं। प्रचार के आखिरी दिन सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के रोड शो और सभा ने इस समीकरण को और मजबूत किया और दो चुनावों के बाद फूलपुर में सपा की साइकिल एक बार फिर निकल पड़ी।
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0 कम मतदान - मतदानों के प्रति लोगों की बेरुखी भाजपा भारी पड़ी। अब तक के सबसे कम मात्र 37.13 फीसदी मतदान के बाद ही भाजपा की हार की अटकलें लगने लगी थीं। भाजपा अपने गढ़ शहर उत्तरी एवं पश्चिमी में ही मतदाताओं को नहीं निकाल पाया।
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0 सपा और बसपा का एक होना- चुनाव के आखिरी दिनों में बसपा के समर्थन ने सपा उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनाया और पार्टी का कैडर वोट नागेंद्र के पक्ष में गया।
0 अतीक के खतरे को भांपने में रही सफल- सपा के रणनीतिकार अतीक अहमद के खतरे को भांपने में सफल रहे। पूरे चुनाव के दौरान भाजपा के साथ सपा की सीधी टक्कर बताने के साथ अतीक को भाजपा की रणनीति का हिस्सा बताने की कोशिश हुई जो सफल रही।
0 भाजपा के वोटरों की बेरुखी - भाजपा के भीतर ही नेताओं और कार्यकर्ताओं की न सुने जाने की शिकायत लंबे समय से है। पार्टी का भीतरघात कई बार बाहर भी दिखा। इसके अलावा आम मतदाताओं में भी नाराजगी रही तथा वे घरों से नहीं निकले।
0 जातीय समीकरण साधने में कामयाब - सपा जातीय समीकरण को साधने में सफल रही। स्थानीयता को हवा देकर पार्टी पटेलों को जोड़ने में रही तो यादवों तथा अन्य पिछड़ी जातियों के साथ बसपा के कैडर मतों ने जीत की आधार रखी।