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High Court :पीएम रिपोर्ट से मेल नहीं खाई मृतक की पत्नी-बेटे की गवाही, कोर्ट से आठ हत्यारोपियों की रिहाई बरकरार

Fri, 05 Dec 2025 08:09 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 05 Dec 2025 08:09 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से हत्या के एक मामले में आठ आरोपियों की रिहाई को बरकरार रखते हुए मृतक की पत्नी मेवाती देवी की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि मुख्य चश्मदीद पत्नी और बेटे की गवाही मेडिकल साक्ष्य से मेल नहीं खाती है।

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testimony of the deceased's wife and son did not match the PM report, the court upheld the acquittal of eight
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से हत्या के एक मामले में आठ आरोपियों की रिहाई को बरकरार रखते हुए मृतक की पत्नी मेवाती देवी की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि मुख्य चश्मदीद पत्नी और बेटे की गवाही मेडिकल साक्ष्य से मेल नहीं खाती है। दोनों का बयान था कि बोलेरो से कुचला गया जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कुचलने जैसी चोट व हाथ-पैर की एक भी हड्डी टूटी नहीं मिली। इसलिए ट्रायल कोर्ट की ओर से दिया गया संदेह का लाभ सही है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा व न्यायमूर्ति डॉ. अजय कुमार द्वितीय की खंडपीठ ने दिया।

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आजमगढ़ के थाना रौनापार में मेवाती देवी ने सुभाष, रामकरण, रामबदन, हीरा, विशन व अन्य सहित आठ लोगों पर मुकदमा दर्ज कराया था। आरोप लगाया था कि उनके पति 2 अगस्त 2011 की दोपहर करीब 12 बजे दूध बेचकर लौट रहे थे तभी भूमि विवाद में घात लगाकर बैठे आरोपियों ने बोलेरो वाहन से उन्हें टक्कर मार दी। इसके बाद पीछा कर पकड़ लिया और सड़क पर गिराकर उनके ऊपर बोलेरो चढ़ा दी। इससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। पत्नी मेवाती देवी और बेटे ने यह सब अपनी आंखों से देखने का दावा किया था। सत्र न्यायाधीश ने 30 अगस्त 2025 को अपना निर्णय सुनाते हुए सभी आठ आरोपियों को बरी कर दिया था। इसके खिलाफ मेवाती देवी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।

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हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया, आरोप यह था कि बोलेरो से कई बार कुचलने के कारण मृतक के हाथ-पैर टूट गए लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में हड्डी टूटने का उल्लेख नहीं मिला। गवाहों के बयान साक्ष्यों के विपरीत पाए गए। अदालत ने कहा कि यदि वे वास्तव में मौके पर मौजूद होते तो उनके बयान इतने विरोधाभासी नहीं होते। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।

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