नदियों से घिरे शहर में नही होना चाहिए भूजल दोहन
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वर्तमान में इलाहाबाद नगर निगम सीमा क्षेत्र की तकरीबन 16 लाख की आबादी को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए 255 ट्यूबवेल हैं, अगले कुछ दिनों में शहर के विभिन्न इलाकों में 16 और ट्यूबवेल लगाए जाने वाले हैं। इन ट्यूबवेलों से गंगा नदी के किनारे बसे सभी मोहल्लों के साथ शहर की तकरीबन 65 फीसदी आबादी को पेयजल उपलब्ध कराया जाता है। इसके इतर यमुना नदी से मात्र 35 फीसदी आबादी के लिए पानी निकाला जाता है। यही कारण है कि शहर में बड़ी संख्या में घरों में लोगों ने बोरिंग करा रखी है। पिछले वर्ष तक यह संख्या करीब 28 हजार थी, जिसमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है। भूजल के इस तरह से हो रहे बेतहाशा दोहन पर स्मार्ट सिटी के लिए काम करने आई अमेरिकी टीम के विशेषज्ञ भी चिंतित हैं।
इलाहाबाद में गंगा-यमुना नदी के रूप में पानी का बड़ा भंडार होने के बावजूद धरती का सीना चीर कर ट्यूबवेलों के जरिए निकाले जा रहे पानी और इससे गिरते भूजल स्तर को अमेरिकी विशेषज्ञों ने बेहद खतरनाक बताया है। यूएसटीडीए के विशेषज्ञ डॉ.मणि वडारी का मानना है कि यही हाल रहा तो आने वाले समय में इलाहाबाद में भूकंप का बड़ा कारण भूजल दोहन बनेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इलाहाबाद को दो भागों में बांटकर गंगा-यमुना से पर्याप्त पानी उपलब्ध कराया जा सकता है। कहा कि अमेरिका के कई शहरों में नदी और झीलों के पानी को अत्याधुनिक तकनीक से शुद्ध कर घरों तक पहुंचाया जाता है लेकिन इलाहाबाद में इसके बारे में कभी भी विचार ही न किया जाना आश्चर्यजनक है।
कहा कि गंगा-यमुना के दोनों किनारे पर इंटेकवेल बनाकर पाइपों के जरिए पानी को जलाशय में पहुंचाया जा सकता है और उसे शुद्ध करके ओवरहेड टैंक और भूमिगत जलाशयों के जरिए घरों तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। इस पर जितनी जल्द काम शुरू होगा, शहर के लिए उतना अच्छा होगा। उन्होंने स्मार्ट सिटी योजना में इस योजना को शामिल करने पर भी सहमति जताई। हालांकि यह भी कहा कि पीपीपी योजना में अमेरिकी कंपनियां इस प्रोजेक्ट पर रुचि लेंगी तभी इस साकार किया जा सकेगा।