पुण्यतिथि पर विशेष : अपनी ही जमीं पर अकबर इलाहाबादी का नाम-ओ-निशान नहीं
16 नवंबर 1846 को इलाहाबाद में जन्मे अकबर इलाहाबादी की सोमवार को 103वीं पुण्यतिथि मनाई जाएगी। इस बार फिर अफसर, नेता और सामाजिक संस्थाओं के लोग कार्यक्रमों में बड़े-बड़े वायदे करके चलते बनेंगे। लेकिन, कुछ नहीं करेंगे।
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खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। ये शेर मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी ने तब लिखा था जब अंग्रेजी हुकूमत में क्रूरता अपने चरम पर थी। उन्होंने अखबार को उस वक्त एक बड़ी ताकत के रूप में देखा था। लेकिन, शहर के लिए शर्मनाक बात है कि पूरी दुनिया से रिश्ता जोड़ने वाले अकबर इलाहबादी का अपनी ही जमीं पर नाम-ओ निशान नहीं।
16 नवंबर 1846 को इलाहाबाद में जन्मे अकबर इलाहाबादी की सोमवार को 103वीं पुण्यतिथि मनाई जाएगी। इस बार फिर अफसर, नेता और सामाजिक संस्थाओं के लोग कार्यक्रमों में बड़े-बड़े वायदे करके चलते बनेंगे। लेकिन, कुछ नहीं करेंगे। अकबर को क्या मालूम था कि जो शहर कभी उनके नाम से जाना जाता था, जिसकी चिट्ठियों में पते की जगह सिर्फ अकबर इलाहाबादी लिखा होता था। उनके इस दुनिया से जाने के बाद कोई निशान बाकी नहीं रहेगा।
पैतृक आवास रानी मंडी वाली कोठी इशरत मंजिल कभी गुलजार रहा करती थी। अब वहां सिर्फ यादगारे हुसैनी इंटर कॉलेज है। इसमें उनकी किसी भी विरासत को सहेज कर नहीं रखा गया है। वहीं, उनकी मजार भी बदहाल स्थिति में है। जो काला डांडा कब्रिस्तान में है। यहां शबेरात पर भी कुछ चाहने वालों के सिवा परिवार का कोई भी शख्स चरागां के लिए नहीं जाता।
स्कूल के प्रबंधक गौहर काजमी कहते हैं कि अकबर इलाहाबाद के नाम से कोई खास कमरा नहीं है और न ही यहां उनसे जुड़ीं चीजें। हां, उनके नाम पर एक हॉल का नामकरण किया गया है। हालांकि, उन्होंने पहली पत्नी के नहीं रहने पर दूसरी शादी की थी। दोनों पत्नियों से दो-दो संतानें हुईं। पूरी दुनिया से रिश्ता जोड़ने वाले अकबर अपने ही शहर में अनजान जैसे हो गए हैं।
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो...
विद्रोही स्वभाव के शायर अकबर इलाहाबादी रूढ़िवादिता एवं धार्मिक ढोंग के सख्त खिलाफ थे। वह अपनी शायरी में इस पर तंज किया करते थे, कौम के गम में डिनर खाते हैं, हुक्काम के साथ, रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ। अखबार की अहमियत पर कहा था, खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। उनकी सबसे मशहूर गजल शराब पर ही है, जिसे गुलाम अली ने गाकर अमर कर दिया है। ‘हंगामा है क्यूं बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है/डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है।’
इशरत मंजिल की तर्ज पर रखा गया था आनंद भवन का नाम
अकबर इलाहाबादी और मोतीलाल नेहरू बहुत अच्छे मित्र थे। जब मोती लाल नेहरू ने आनंद भवन खरीदा तो उन्होंने नाम के लिए सलाह ली तो अकबर ने कहा था कि मेरी इशरत मंजिल का तर्जुमा (अनुवाद) कर दें, जिसका अर्थ था कि ऐसा भवन जहां आनंद हो। वहीं, आनंद भवन का नाम मिल गया।