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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Special on birth anniversary: Storyteller Doodhnath Singh was the king of his destruction.

जयंती पर विशेष : अपनी विनाशलीला के बादशाह थे कथाकार दूधनाथ सिंह

Thu, 17 Oct 2024 02:29 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 17 Oct 2024 02:29 PM IST
सार

दूधनाथ सिंह 1956 में इलाहाबाद आए और यहीं के होकर रह गए। 1958 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए करके नौकरी के लिए भटके। 1960-62 में कलकत्ता में अध्यापन किया, किंतु इलाहाबाद का चस्का लगने के कारण उसे छोड़ आए।

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Special on birth anniversary: Storyteller Doodhnath Singh was the king of his destruction.
दूधनाथ सिंह। फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

दूधनाथ सिंह 1956 में इलाहाबाद आए और यहीं के होकर रह गए। 1958 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए करके नौकरी के लिए भटके। 1960-62 में कलकत्ता में अध्यापन किया, किंतु इलाहाबाद का चस्का लगने के कारण उसे छोड़ आए। तब तक लिखने-पढ़ने का नशा लग चुका था। गोष्ठियां, साहित्यिक उठापटक, गप्पबाजी, काफी हाउसिंग, यह सब आजीविका के रास्ते के रोड़े थे। अपनी इस बर्बादी में वह खुशी-खुशी शरीक थे। कहते थे, मैं अपनी विनाशलीला का बादशाह हूं।

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सभी छोटे भाई खेतीबाड़ी करते थे या फिर पुलिस की नौकरी। घरवालों को उनसे बहुत आशा थी। वह उनकी निगाह में आवारा थे। लेखक बनने की झक जो सवार थी। किराया न दे पाने के कारण कई बार उन्हें बाल्टी, लोटा, बिस्तर और किताबें छोड़कर भागना पड़ा। पुरुषोत्तम नगर, मुट्ठीगंज, चैथम लाइन, लीडर प्रेस कंपाउंड आदि कई ठिकाने बदलने पड़े। यह भुखमरी के दिन थे।

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उन्होंने लिखा भी है, ''मैं लगभग बेपर्द और निहंग हो गया था। एक ऐसे भिखारी की तरह जिसके पास अपने लुगड़े (धोती) भी नहीं बचे थे। ...मेरा आत्मसम्मान भी नहीं बचा था।'' वह कई दिन रेलवे स्टेशन के हाल के एक कोने में सोते थे। दया करके भारती भंडार के मालिक वाचस्पति पाठक ने अपने घर का एक कमरा उन्हें दिया। इस बीच पत्नी और दो बच्चे हो गए किंतु उनके पास कोई काम नहीं था।

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जिस दिन दूधनाथ सिंह की पहली किताब ''अपनी शताब्दी के नाम'' की लेखकीय प्रतियां पहुंचीं, उनके घर में खाने को कुछ नहीं था। वे बेटे को चीनी-पानी पिला रहे थे। किताबें देखकर वह आनंद से भर उठे थे। बाद में सुमित्रानंदन पंत की अनुकंपा से विश्वविद्यालय में अध्यापक हो गए। रसूलाबाद के सेनेटोरियम में टीबी से जूझते वक्त भी अकेले पंतजी ही उन्हें देखने आए थे।

Special on birth anniversary: Storyteller Doodhnath Singh was the king of his destruction.
रविनंदन सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार। - फोटो : अमर उजाला।

साजिश के तहत कराया गया था फोन

दूधनाथजी ने एकेडेमी में एक बैठकी के दौरान मुझे बताया था कि उनकी पहली कहानी की चर्चा के लिए मंच पर भैरवप्रसाद गुप्त, मार्कंडेय, नरेश मेहता, रघुवंश, अमृतराय जैसे दिग्गज विराजमान थे। उस दिन सरेआम उनकी धज्जियां उड़ाई गईं। सलाह मिली, कहानी लिखना छोड़ें, कविताएं ही लिखें। उस दिन कहानीकार बनने का नशा चूर हो चुका था। कई दिनों तक बेचैन रहे। फिर चुनौती स्वीकार कर ली। जिद ओढ़ ली और साठोत्तरी पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ कथाकारों में शामिल हुए। कहते थे, आजकल लोग आलोचनाओं का बुरा मान जाते हैं, जबकि यह लेखक की मंजाई का काम करती है।

अपने गुरु डॉ धीरेंद्र वर्मा की ग्रंथावली पर काम करते वक्त दूधनाथजी हिंदुस्तानी एकेडेमी अक्सर आते थे। यहीं एक रोज किसी का फोन आया तो दूधनाथजी डांटने के अंदाज में बोले, ''''मैं किसी पुरस्कार के लिए अपनी संस्तुति नहीं कराऊंगा, क्यों कराऊं, मुझे नहीं चाहिए पुरस्कार।'''' फिर पूछने पर बोले, ''''कह रहा था कि हिंदी संस्थान के महात्मा गांधी सम्मान के लिए किसी से संस्तुति करा दीजिए।'''' उसी साल उन्हें संस्थान का भारत भारती सम्मान मिला। संस्तुति करा देते तो यह सम्मान उन्हें नहीं मिलता। वह फोन इसी साजिश का हिस्सा था। - रविनंदन सिंह- (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)

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