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सोरांव विधानसभा : जनता से दूरी बनाना जमुना प्रसाद को पड़ा महंगा, महापुरुषों की जयंती न मनाने से भी लोग रहे नाराज

Mon, 14 Mar 2022 09:04 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज
अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 14 Mar 2022 09:04 PM IST
सार

क्षेत्र के लोगों की माने तो पिछले चुनाव में बसपा प्रत्याशी रहीं गीता पासी ने इस बार माहौल को भांपते हुए सपा में शामिल हो गईं। पांच साल वह पूरे क्षेत्र में लोगों के बीच रहीं और समस्याओं को लेकर संघर्ष भी करती रहीं, जिसका परिणाम यह हुआ की भाजपा की लहर के बावजूद जमुना प्रसाद अपनी सीट नहीं बचा सके। 

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Soraon Assembly: Jamuna Prasad was costly to keep distance from the public,
Prayagraj News : अपनादल एस से सोरांव से प्रत्याशी जमुना प्रसाद सरोज। - फोटो : प्रयागराज

विस्तार

गंगापार की सोरांव (सुरक्षित) विधानसभा सीट पर अपना दल एस के डॉ. जमुना प्रसाद को करारी हार का सामना करना पड़ा। पांच साल के कार्यकाल के दौरान लगातार लोगों से दूरी बनाए रखना उनको भारी पड़ गया। पार्टी ने उन्हें दोबारा तो टिकट दे दिया लेकिन वह जनता का विश्वास हासिल करने में असफल रहे।

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क्षेत्र के लोगों की माने तो पिछले चुनाव में बसपा प्रत्याशी रहीं गीता पासी ने इस बार माहौल को भांपते हुए सपा में शामिल हो गईं। पांच साल वह पूरे क्षेत्र में लोगों के बीच रहीं और समस्याओं को लेकर संघर्ष भी करती रहीं, जिसका परिणाम यह हुआ की भाजपा की लहर के बावजूद जमुना प्रसाद अपनी सीट नहीं बचा सके। 
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अधिवक्ता अभिषेक शुक्ला का कहना है कि अपना दल एस भाजपा के गठबंधन के निवर्तमान विधायक डॉक्टर जमुना प्रसाद सरोज ने ऊदा देवी, बिजली पासी को छोड़कर अन्य किसी भी महान व्यक्तियों की जयंती नहीं मनाई। इसका भी खामियाजा भुगतना पड़ा। उनके इस कृत्य से उनके प्रति लोगों में नकारात्मक विचार भावना उत्पन्न हुई। जिसको सपा ने बखूबी भुनाया।

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दूसरे प्रत्याशी को टिकट मिलता तो शायद होती जीत


क्षेत्र के समाजसेवी आलोक कुमार कहते हैं कि 2017 के चुनाव में विधायक बनने के बाद अपने ही कार्यकर्ताओं की उपेक्षा शुरू कर दी। इसका काफी गलत संदेश पार्टी के अंदर गया। पार्टी ने उन्हें दोबारा टिकट देकर भी गलती की। उनके स्थान पर किसी दूसरे नेता को टिकट मिला होता तो शायद सोरांव की सीट आज भाजपा गठबंधन के पास होती। 



अधिवक्ता प्रदीप केसरवानी की राय इऩ सबसे अलग थी। उनका कहना है कि पिछला चुनाव बसपा से लड़ने के कारण इस बार सपा से लड़ने के बावजूद गीता बसपा का काफी वोट हासिल करने में सफल रहीं, जबकि अन्य विधानसभा में यह उल्टा हुआ और बसपा का वोट भाजपा गठबंधन में शिफ्ट हुआ। अद प्रत्याशी की छवि क्षेत्र में ठीक न होने के कारण लोगों ने गीता पर ही विश्वास जताया।

 

पांच साल क्षेत्र में समय देने का गीता को मिला इनाम


गीता पासी पूरे पांच साल तक क्षेत्र के लोगों से किसी न किसी रूप में जुड़ी रहीं, जिससे उनकी पहचान संघर्ष करने वाली नेत्री के रूप में बनी। यही कारण रहा कि बड़े नेताओं की सभा होने के बाद भी जमुना प्रसाद विधानसभा में दूसरी बार नहीं पहुंच सके। विकास कुमार का कहना है कि क्षेत्रीय होने के कारण लोगों ने गीता शास्त्री पर ज्यादा विश्वास किया। लगातार क्षेत्र से नदारद रहने के चलते जमुना को लोगों ने पसंद नहीं किया। 



समाजसेवी महेंद्र कुमार वैश्य का कहना है कि पिछला चुनाव जीतने के बाद से ही जमुना प्रसाद ने क्षेत्रवासियों से दूरी बना ली। उन्हें शायद यह नहीं पता कि यह लोकतंत्र है यहां हर पांच साल पर हिसाब किताब बराबर किया जाता है। लोगों के बीच उनके प्रति बनी नकारात्मक छवि अंत तक कायम रही। 

 

पिछले चुनाव में पराजित हुईं गीता ने इस बार लिया बदला

 

बता दें कि बसपा छोड़ साइकिल पर सवार हुईं गीता शास्त्री ने 89792 मत के साथ 2017 में मिली शिकस्त का बदला लिया। उन्होंने अपना दल प्रत्याशी डॉ. जमुना प्रसाद सरोज को लगभग 5,133 मतों से पराजित किया। जमुना प्रसाद को पिछली बार 77814 मत मिले थे, लेकिन इस बार 84659 मत पाने के बाद भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा। पिछली बार दूसरे नंबर रही बहुजन समाज पार्टी को जहां लगभग 60 हजार मत मिले थे, वहीं इस बार 28,819 मत ही मिले हैं। 



जीत हार का अंतर --- 5133
किसको कितने मत मिले 
सपा गीता शास्त्री --- 89792
अपना दल एस जमुना प्रसाद --- 84659
बसपा आनंद भारती --- 28819
कांग्रेस मनोज कुमार पासी--- 2006
अन्य प्रत्याशियों को मिले


अनिल कुमार गौतम 1606, प्रदीप कुमार जाटव 1044,  रत्नेश कुमार चौधरी 943, राकेश कुमार 741, आम आदमी पार्टी लल्लन  1007, एआईएमआईएम सीताराम 5075, जनसत्ता दल सुधीर कुमार 1169, राकेश कुमार गौतम 1097, नोटा -- 1682, कुल मत 219650।

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