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समानता की सनातन अवधारणा पर मुहर लगना सुखद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 03 Apr 2016 02:02 AM IST
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शनि शिंगणापुर सहित महाराष्ट्र में धार्मिक स्थलों में महिलाओं केजाने पर लगी रोक को रद्द किए जाने पर समाज के विभिन्न वर्ग के लोगों ने सुखद बताया है। बांबे हाईकोर्ट के फैसले ‘धार्मिक स्थलों पर लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। मंदिर में जाना महिलाओं का मौलिक अधिकार है’ को महिलाओं को समानता का दर्जा मिलने की विचारधारा की जीत मानी जा रही है। महिलाओं ने इसे अपना हक बताया तो विभिन्न वर्ग के लोगों ने इसे मौलिक अधिकार की संज्ञा दी।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रंजना कक्कड़ कहती हैं, अरसे से महिलाएं आजादी की लड़ाई लड़ रही हैं। शनि शिंगणापुर में पूजा का अधिकार पाने की मुहिम में कोर्ट का निर्णय महिलाओं का मनोबल बढ़ाने वाला है। परंपरा के नाम पर हो रहे शोषण से आजादी पाने की कोशिशें धीरे-धीरे ही सही रंग ला रही हैं। योग प्रशिक्षक नीतू सिंह का मानना है कि धर्म के क्षेत्र में भेदभाव का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। वैदिक काल में महिलाओं को पुरुषों के समान वेदाध्ययन का अधिकार रहा है। इसलिए परंपरा के नाम पर दोहरा व्यवहार अनुचित है। मंदिर में पूजा करने का हक पाना सुखद है। सही मायने में अदालत ने संविधान से मिले मौलिक अधिकार को बहाल किया है।
ईश्वर शरण डिग्री कालेज के प्राचार्य डा.आनंद शंकर सिंह का कहना है कि सनातन धर्म की सर्जना वेदों से हुई है। वैदिक काल में महिलाओं को समानता का अधिकार प्राप्त था। उनका संपूर्ण उपनयन संस्कार होता था। लिंग के आधार पर होने वाले लोकाचार को सनातन धर्म का बताना अनुचित है। सनातन परंपरा में यज्ञ पूजा अनुष्ठान, तीर्थयात्रा स्त्री के बगैर पूर्ण नहीं है।
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आयुर्वेदाचार्य डा.एसके राय कहते हैं, राकेट युग में बैलगाड़ी की बात बेमानी है। आज के समय में महिलाओं ने हर क्षेत्र में कामयाबी दर्ज की है। देश में सर्वांगीण विकास तभी हो सकेगा जब पुरुषों के साथ महिलाएं भी कंधे से कंधा मिलाकर चलें। बांबे हाईकोर्ट का निर्णय स्वागतयोग्य है, इसने समानता की सनातन अवधारणा पर मुहर लगा दी है। पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा उथल-पुथल और पिछड़ापन वहीं है जहां महिलाओं पर बंधन हैं। आचार्य पुरोहित विद्याकांत पांडेय कहते हैं, महिलाओं के साथ कोई भेदभाव का विधान शास्त्रों में नहीं है। जो पूजा करने आता है हम पूजन कराते हैं। यह बात अलग है प्राकृतिक कारणों से महिलाओं के लिए कुछ दिनों तक मंदिर में प्रवेश, पूजा से परहेज की बात है लेकिन इसे भेदभाव का नाम नहीं दिया जाना चाहिए।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रंजना कक्कड़ कहती हैं, अरसे से महिलाएं आजादी की लड़ाई लड़ रही हैं। शनि शिंगणापुर में पूजा का अधिकार पाने की मुहिम में कोर्ट का निर्णय महिलाओं का मनोबल बढ़ाने वाला है। परंपरा के नाम पर हो रहे शोषण से आजादी पाने की कोशिशें धीरे-धीरे ही सही रंग ला रही हैं। योग प्रशिक्षक नीतू सिंह का मानना है कि धर्म के क्षेत्र में भेदभाव का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। वैदिक काल में महिलाओं को पुरुषों के समान वेदाध्ययन का अधिकार रहा है। इसलिए परंपरा के नाम पर दोहरा व्यवहार अनुचित है। मंदिर में पूजा करने का हक पाना सुखद है। सही मायने में अदालत ने संविधान से मिले मौलिक अधिकार को बहाल किया है।
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ईश्वर शरण डिग्री कालेज के प्राचार्य डा.आनंद शंकर सिंह का कहना है कि सनातन धर्म की सर्जना वेदों से हुई है। वैदिक काल में महिलाओं को समानता का अधिकार प्राप्त था। उनका संपूर्ण उपनयन संस्कार होता था। लिंग के आधार पर होने वाले लोकाचार को सनातन धर्म का बताना अनुचित है। सनातन परंपरा में यज्ञ पूजा अनुष्ठान, तीर्थयात्रा स्त्री के बगैर पूर्ण नहीं है।
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आयुर्वेदाचार्य डा.एसके राय कहते हैं, राकेट युग में बैलगाड़ी की बात बेमानी है। आज के समय में महिलाओं ने हर क्षेत्र में कामयाबी दर्ज की है। देश में सर्वांगीण विकास तभी हो सकेगा जब पुरुषों के साथ महिलाएं भी कंधे से कंधा मिलाकर चलें। बांबे हाईकोर्ट का निर्णय स्वागतयोग्य है, इसने समानता की सनातन अवधारणा पर मुहर लगा दी है। पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा उथल-पुथल और पिछड़ापन वहीं है जहां महिलाओं पर बंधन हैं। आचार्य पुरोहित विद्याकांत पांडेय कहते हैं, महिलाओं के साथ कोई भेदभाव का विधान शास्त्रों में नहीं है। जो पूजा करने आता है हम पूजन कराते हैं। यह बात अलग है प्राकृतिक कारणों से महिलाओं के लिए कुछ दिनों तक मंदिर में प्रवेश, पूजा से परहेज की बात है लेकिन इसे भेदभाव का नाम नहीं दिया जाना चाहिए।