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घर बनाने से ज्यादा बचाने में कर दिया खर्च
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 12 Jul 2015 02:01 AM IST
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इलाहाबाद(ब्यूरो)। अपना घर बनवाने के लिए पहले लाखों रुपये लगाए और फिर उसे बचाने के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़े। पहले भूमाफिया ने ठगा और राजकीय आस्थान की जमीन (स्टेट लैंड) को भूमिधरी बताकर बेच दिया। बाद में सरकार के नुमाइंदों ने बेदखली के नोटिस की आड़ में जमकर वसूली की। शहर में एक छोटा सा आशियाना बनाना इतना महंगा पड़ गया कि लोगों को घर बनाने से ज्यादा उसे बचाने में पैसा खर्च करना पड़ा गया।
सलोरी, चांदपुर सलोरी, बेली, बघाड़ा सहित शहर के तमाम इलाकों में राजकीय आस्थान की जमीन पर लाखों की आबादी रहती है। स्टेट लैंड को फ्रीहोल्ड किए जाने का अब तक कोई प्रावधान नहीं है, सो सरकारी दस्तावेजों में यह आबादी अवैध है। साल में कम से कम एक बार स्टेट लैंड में बसे लोगों को बेदखली का नोटिस जारी किया जाता है। यह सिलसिला पिछले 20 वर्षों से जारी है।
नोटिस जारी होते ही लोगों को अपने घरों पर बुलडोजर चलने की आशंका सताने लगती है, फिर उसके बाद तहसील के चक्कर लगाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। कार्रवाई का भय दिखाकर लोगों से वसूली की जाती है। वर्षों से यह समस्या झेल रहे लोगों को उम्मीद थी कि इस साल राहत मिल जाएगी। शासन फ्रीहोल्ड की प्रस्तावित नीति को लागू कर देगा लेकिन अब तक यह मामला अटका हुआ है। फीहोल्ड की प्रस्तावित पुरानी नीति निरस्त कर एक नई प्रस्तावित नीति बनाने का काम शुरू तो हो गया है लेकिन आगामी पंचायत चुनाव की अधिसूचना कम से कम इस साल प्रस्तावित नीति को लागू करने में आड़े आ सकती है। ऐसे में राजकीय आस्थान की जमीन पर बसी लाखों की आबादी को राहत के लिए कम से कम एक साल और इंतजार करना पड़ सकता है।
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सलोरी, चांदपुर सलोरी, बेली, बघाड़ा सहित शहर के तमाम इलाकों में राजकीय आस्थान की जमीन पर लाखों की आबादी रहती है। स्टेट लैंड को फ्रीहोल्ड किए जाने का अब तक कोई प्रावधान नहीं है, सो सरकारी दस्तावेजों में यह आबादी अवैध है। साल में कम से कम एक बार स्टेट लैंड में बसे लोगों को बेदखली का नोटिस जारी किया जाता है। यह सिलसिला पिछले 20 वर्षों से जारी है।
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नोटिस जारी होते ही लोगों को अपने घरों पर बुलडोजर चलने की आशंका सताने लगती है, फिर उसके बाद तहसील के चक्कर लगाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। कार्रवाई का भय दिखाकर लोगों से वसूली की जाती है। वर्षों से यह समस्या झेल रहे लोगों को उम्मीद थी कि इस साल राहत मिल जाएगी। शासन फ्रीहोल्ड की प्रस्तावित नीति को लागू कर देगा लेकिन अब तक यह मामला अटका हुआ है। फीहोल्ड की प्रस्तावित पुरानी नीति निरस्त कर एक नई प्रस्तावित नीति बनाने का काम शुरू तो हो गया है लेकिन आगामी पंचायत चुनाव की अधिसूचना कम से कम इस साल प्रस्तावित नीति को लागू करने में आड़े आ सकती है। ऐसे में राजकीय आस्थान की जमीन पर बसी लाखों की आबादी को राहत के लिए कम से कम एक साल और इंतजार करना पड़ सकता है।
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