महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि पर विशेष : दो दशकों बाद मिली महादेवी वर्मा की रचनाओं की रॉयल्टी
विविधतापूर्ण साहित्यिक गतिविधियों के आयोजन के लिए महादेवी ने साहित्य सहकार न्यास की स्थापना की थी। उनके दिवंगत हो जाने के बाद उनकी किताबों की रॉयल्टी की राशि इस न्यास के खाते में जाती रही। महादेवी की पुस्तकें प्रकाशित करने वाले सभी नामचीन प्रकाशक हैं।
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महाप्राण निराला से लेकर डॉ. हरिवंश राय बच्चन तक की रचनाओं की रॉयल्टी के लिए जीवनभर आवाज उठाने वाली हिंदी की अनन्य सेविका महादेवी वर्मा की किताबों पर भारतीय ज्ञानपीठ ने रॉयल्टी देने की शुरुआत कर दी है। महादेवी के अन्य प्रकाशकों ने भी उनकी किताबों पर रॉयल्टी देने का सिलसिला शुरू करने के लिए हामी भरी है। ऐसा सुखद दौर दो दशक बाद आया है।
दरअसल, विविधतापूर्ण साहित्यिक गतिविधियों के आयोजन के लिए महादेवी ने साहित्य सहकार न्यास की स्थापना की थी। उनके दिवंगत हो जाने के बाद उनकी किताबों की रॉयल्टी की राशि इस न्यास के खाते में जाती रही। महादेवी की पुस्तकें प्रकाशित करने वाले सभी नामचीन प्रकाशक हैं। न्यास को मिलने वाली राशि से ही जनकवि कैलाश गौतम, न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त सरीखे अनेक हिंदीसेवियों के सम्मान सहित अन्य साहित्यिक गतिविधिां आयोजित की जाती रही हैं।
ट्रस्ट के सचिव ब्रजेश कुमार पांडेय कहते हैं, रॉयल्टी न मिलने के कारण निरंतरता में ट्रस्ट के आयोजनों सहित महादेवी की धरोहर के रखरखाव में भी असुविधा हो रही थी। हालांकि ट्रस्ट के सदस्यों के आंशिक आर्थिक सहयोग से अर्जित राशि से यथासंभव गतिविधियां संचालित की जाती रही हैं। अब लंबे पत्र व्यवहार के बाद भारतीय ज्ञानपीठ सहित अन्य प्रकाशक चेते हैं। भारतीय ज्ञानपीठ से रॉयल्टी भिजवा दी है। अन्य प्रकाशकों ने जल्द ही भिजवाने का भरोसा दिलाया है।
अधूरा ही रह गया वीर बहादुर का वादा
महादेवी के संदर्भ में यह हैरत की बात है कि प्रकाशक ही नहीं सरकार की ओर से भी आर्थिक सहयोग की अनदेखी की गई। 11 सितंबर 1987 को देहावसान के बाद रसूलाबाद घाट पर जब महादेवी की अंत्येष्टि हो रही थी तो प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने भी पहुंचकर उनकी स्मृतियों को संजोए रखने के लिए सहकार न्यास को दस लाख रुपये देने का आश्वासन दिया था। तीन दशक बीत गए, यह वादा पूरा हो सका।