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नदियों किनारे निर्माण पर लगे प्रतिबंध
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
Updated Tue, 09 Dec 2014 11:58 PM IST
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गंगा-यमुना और उनकी सहायक नदियों के किनारे बसे शहरों में उच्चतम बाढ़ बिंदु से पांच सौ मीटर की दूरी तक किसी भी प्रकार के निर्माण पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। अभी तक यह प्रतिबंध मात्र इलाहाबाद में पांच सौ मीटर का और वाराणसी में दो सौ मीटर तक का है। अधिवक्ता माधवेंद्र प्रताप सिंह ने जनहित याचिका दाखिल कर सरकार को ऐसा आदेश देने की मांग की है। याचिका पर सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश डा. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल की खंडपीठ ने प्रदेश सरकार से इस मामले में छह सप्ताह में जवाब मांगा है।
याची का कहना है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों यमुना, रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोशी, काली और चंबल, सिंध, बेतवा, केन, टोंस, सोन, दामोदर, कंगनसबती, हल्दी के उच्चतम बाढ़ बिंदु से पांच सौ मीटर की दूरी तक कोई निर्माण नहीं होना चाहिए। कोर्ट से विकास प्राधिकरणों, प्राइवेट बिल्डरों या निजी भवन निर्माताओं पर रोक लगाने की मांग की गई है। याची का तर्क है कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना राज्य और केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। संविधान के अनुच्छेद 48 (अ) और 51(अ) के तहत नदियों, झीलों, नालों और तालाबों जैसे प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार शहरों में दूषित जल के शोधन की क्षमता उत्सर्जन का मात्र 48 फीसदी है। शेष सीवर का पानी बिना शोधन के गंगा में बहाया जाता है। नदियों में प्रदूषण काफी बढ़ गया है इसलिए बिना एसटीपी के किसी भी आवासीय परियोजना को अनुमति न दी जाए। याचिका पर अब गंगा प्रदूषण याचिका और वाराणसी की कौटिल्य सोसाइटी द्वारा दाखिल याचिका के साथ सुनवाई की जाएगी।
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याची का कहना है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों यमुना, रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोशी, काली और चंबल, सिंध, बेतवा, केन, टोंस, सोन, दामोदर, कंगनसबती, हल्दी के उच्चतम बाढ़ बिंदु से पांच सौ मीटर की दूरी तक कोई निर्माण नहीं होना चाहिए। कोर्ट से विकास प्राधिकरणों, प्राइवेट बिल्डरों या निजी भवन निर्माताओं पर रोक लगाने की मांग की गई है। याची का तर्क है कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना राज्य और केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। संविधान के अनुच्छेद 48 (अ) और 51(अ) के तहत नदियों, झीलों, नालों और तालाबों जैसे प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है।
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प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार शहरों में दूषित जल के शोधन की क्षमता उत्सर्जन का मात्र 48 फीसदी है। शेष सीवर का पानी बिना शोधन के गंगा में बहाया जाता है। नदियों में प्रदूषण काफी बढ़ गया है इसलिए बिना एसटीपी के किसी भी आवासीय परियोजना को अनुमति न दी जाए। याचिका पर अब गंगा प्रदूषण याचिका और वाराणसी की कौटिल्य सोसाइटी द्वारा दाखिल याचिका के साथ सुनवाई की जाएगी।
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