{"_id":"59ee47964f1c1bcc538b8abd","slug":"respect-mother-tongue-caribbean-country-prof-maris","type":"story","status":"publish","title_hn":"मातृभाषा का आदर करते हैं कैरिबियन देश: प्रो. मारिस","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मातृभाषा का आदर करते हैं कैरिबियन देश: प्रो. मारिस
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Tue, 24 Oct 2017 01:19 AM IST
विज्ञापन
इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारत के लोग जहां सार्वजनिक जगहों पर अपनी मातृभाषा को बोलने में हेठी समझते हैं, वहीं कैरिबियन देशों के लोग अपनी मातृभाषा को बहुत ही आदर और सम्मान के साथ बोलते हैं। यह बातें सूरीनाम के जाने-माने इतिहासकार प्रो. मारिस हसन खान ने गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान की ओर से आयोजित व्याख्यानमाला के दौरान सोमवार को कही। प्रो. खान का परिवार शताब्दियों पहले सूरीनाम चला गया था। उन्होंने न केवल भारत में अपनी जड़ों की तलाश की बल्कि कैरिबियन देशों और हालैंड में फैले अपने परिवार के सदस्यों को खोज निकाला।
प्रो. मारिस ने कहा कि सूरीनाम, मारीशस, त्रिनिदाद-टोबेगो, बारबोडस में रहने वाले निवासियों की एक बड़ी संख्या भारतवंशियों से मिलकर बनी है। सूरीनाम में शिक्षा का माध्यम डच होने के बावजूद लोग अपने घरों में अवधी, भोजपुरी और मगही बोलते हैं। प्रो. मारिस ने कहा कि लगभग 100 से अधिक देशों में भारत के लोग मजदूरों के रूप में गए। उनका इतिहास लिखे बिना भारत का इतिहास और संस्कृति अपूर्ण रहेगी।
सूरीनाम की ही डॉ. शहंशाह रामदास ने कैरिबियन देशों की महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं पर बात की। उन्होंने भोजपुरी गीत भी सुनाया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. भास्कर मजूमदार ने की। संस्थान के निदेशक प्रो. बद्री नारायण ने कहा कि भारत को ठीक से समझने के लिए कैरिबियन देशों के कला, साहित्य और संस्कृति को समझाना अनिवार्य शर्त है। इस दिशा में संस्थान पिछले एक दशक से शोधकार्य में लगा है। इस मौके पर डॉ अर्चना सिंह, बृजेन्द्र गौतम, जय प्रकाश त्रिपाठी, डॉ रमाशंकर सहित संस्थान के शोधछात्र एवं परस्नातक कक्षाओं के छात्र-छात्राएं मौजूद थे
विज्ञापन
विज्ञापन
प्रो. मारिस ने कहा कि सूरीनाम, मारीशस, त्रिनिदाद-टोबेगो, बारबोडस में रहने वाले निवासियों की एक बड़ी संख्या भारतवंशियों से मिलकर बनी है। सूरीनाम में शिक्षा का माध्यम डच होने के बावजूद लोग अपने घरों में अवधी, भोजपुरी और मगही बोलते हैं। प्रो. मारिस ने कहा कि लगभग 100 से अधिक देशों में भारत के लोग मजदूरों के रूप में गए। उनका इतिहास लिखे बिना भारत का इतिहास और संस्कृति अपूर्ण रहेगी।
विज्ञापन
सूरीनाम की ही डॉ. शहंशाह रामदास ने कैरिबियन देशों की महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं पर बात की। उन्होंने भोजपुरी गीत भी सुनाया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. भास्कर मजूमदार ने की। संस्थान के निदेशक प्रो. बद्री नारायण ने कहा कि भारत को ठीक से समझने के लिए कैरिबियन देशों के कला, साहित्य और संस्कृति को समझाना अनिवार्य शर्त है। इस दिशा में संस्थान पिछले एक दशक से शोधकार्य में लगा है। इस मौके पर डॉ अर्चना सिंह, बृजेन्द्र गौतम, जय प्रकाश त्रिपाठी, डॉ रमाशंकर सहित संस्थान के शोधछात्र एवं परस्नातक कक्षाओं के छात्र-छात्राएं मौजूद थे
विज्ञापन