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आरक्षण से बढ़ी दिलों में दूरी

Sat, 17 Oct 2015 01:57 AM IST
Updated Sat, 17 Oct 2015 01:57 AM IST
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Reservations hearts grew distance
इलाहाबाद (ब्यूरो)। जाति आधारित सियासत ने हाईकोर्ट के निर्देश और समाजशास्त्रियों की चेतावनी को भी दरकिनार कर दिया है जिससे जातीय संघर्ष खतरनाक स्थिति तक पहुंच गया है। सरकारी नौकरियों में हर जाति की कितनी हिस्सेदारी है, इस बाबत हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी सभी राज्यों से इस बाबत रिपोर्ट मांगी है, लेकिन वोट बैंक को बचाने की खातिर सरकारें सर्वे कराने से भी पीछे हट रही हैं। आरक्षण को लेकर छिड़ी बहस के बीच समाजशास्त्रियों ने भी चेतावनी दी है कि यदि इस पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो जातियों के बीच बढ़ती दूरी समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएगी।
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डॉ.भीमराव अंबेडकर ने दस वर्षों के लिए आरक्षण की बात कही थी। मगर, सामाजिक समता का डॉ.अंबेडकर का यह फार्मूला वोट बैंक की राजनीति में बदल गया। होना तो यह चाहिए था कि  दस वर्षों यानी, एक पीढ़ी के बाद आरक्षण की समीक्षा की जाती।
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इस बात की पड़ताल होनी जरूरी थी कि सरकारी नौकरी में किस जाति को कितना प्रतिनिधित्व मिल पाया है और कौन सी ऐसी जातियां हैं जिनको वास्तव में आरक्षण का लाभ नहीं मिला, लेकिन आजादी के 67 वर्षों बाद भी किसी भी पार्टी की सरकार ने यह समीक्षा करने की हिम्मत नहीं जुटाई। वजह साफ है कि सरकारें अपने प्रदर्शन से नहीं, जातीय समीकरण से बन रही हैं। नौकरियों में जाति आधारित रिपोर्ट मांगने तथा प्रमोशन में आरक्षण पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से भी इस ओर संकेत मिलता है कि कहीं न कहीं इस टकराव को रोकना चाहिए।
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खतरे से आगाह करते हुए समाजशास्त्रियों का साफतौर पर कहना है कि आरक्षण पाने वाली जातियों के बीच भी दूरी बढ़ गई है। आरक्षण का पूरा लाभ कुछ जातियां ही पा रही हैं और वे आरक्षण पर एकाधिकार भी समझने लगी हैं। इससे अन्य जातियां और पीछे होती जा रही हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के डॉ.आशीष सक्सेना का कहना है कि अलग-अलग सर्वे में यह बात सामने आई है कि कुछ जातियां तो ऐसी हैं जिन्हें आरक्षण का ज्ञान ही नहीं है। नतीजतन, आरक्षण पाने वाली जातियों के बीच भी संघर्ष शुरू हो गया है।

अहम के इस टकराव में कई नई जातियां भी संघर्ष के लिए खड़ी हो रही हैं। इसी तरह आरक्षण जारी रहा तो नई-नई जातियां संघर्ष के लिए खड़ी होंगी। इसका कोई अंत नहीं है। इस टकराव को रोकने के लिए जरूरी है कि आरक्षण की समीक्षा हो। कई क्षेत्र हैं जहां के लोग काफी पीछे हैं। उसमें सभी जाति के लोग हैं। इसलिए जरूरी है कि आरक्षण जाति आधारित न होकर वर्ग तथा आर्थिक आधार पर हो। इससे समाज को दोहरा लाभ होगा। एक तो जरूरतमंद लोगों को इसका फायदा होगा और साथ में वर्ग संघर्ष भी खत्म होगा।


आरक्षण तथा अन्य वजहों से बढ़ते जातीय संघर्ष की चपेट में सरकारी योजनाएं भी हैं। कई जिलों में एमजी मनरेगा की असफलता के पीछे इस संघर्ष को ही कारण बताया जा रहा है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डॉ.आशीष सक्सेना के निर्देशन में हुए सर्वे में पाया गया कि गोरखपुर में कई जातियां इस योजना के बारे में जानती ही नहीं। गाेंड समेत कई जातियों को इस तरह की योजनाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं है। कुछ चुनिंदा जातियों को ही इसका लाभ मिला। जम्मू कश्मीर में भी इसी तरह की बात सामने आई है।
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