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गंगा की गोद से निकालें गाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Thu, 28 Apr 2016 02:35 AM IST
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पानी के अभाव में सूखा रहा हैं गंगातट। गंगा में जगह-जगह पर रेत के टीले उभर आए हैं।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वाराणसी में गंगा की सहायक नदियों की सफाई का दावा करते हुए कई अन्य घोषणाओं कीं। साथ ही गंगा की सफाई के लिए केंद्र सरकार से मदद भी मांगी। अविरल-निर्मल गंगा के लिए केंद्र सरकार की ओर से पहले से ही कई योजनाएं संचालित हैं। गंगा की सफाई पर अरबाें रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन जमीनी सच्चाई इसके एकदम उलट है। गंगा से जुड़ी संस्थाएं सिर्फ योजनाएं बनाने में ही जुटी हैं।
गंगा में कितना जल है और कितना साफ है, दोनों बातों की सच्चाई कानपुर से इलाहाबाद के बीच में साफ देखी जा सकती है। इलाहाबाद में तो गंगा का मूल पानी ही नहीं बचा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी मुख्य वजह सही समय पर उचित कदम न उठाना है। गंगा में जल का बहाव निरंतर बना रहे, इसके लिए इसकी अविरलता जरूरी है। इसी तरह गंगा से गाद भी निकालनी होगी जिसके लिए यही एकदम उपयुक्त समय है क्योंकि इस समय गंगा में पानी कम है। विशेषज्ञों की सलाह है कि बारिश के पानी को रोकने के लिए कछारी इलाके में तालाब बनाए जाने चाहिए और पानी कम होने की वजह से इसके लिए भी यही सबसे उपयुक्त समय है। इस अभियान में ग्रामीणों और स्थानीय लोगों को भी जोड़ा जा सकता है।
बीते तीन दशकों से अधिक समय से गंगा पर शोध कर रहे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बॉटनी विभाग के प्रोफेसर दीनानाथ शुक्ला कहते हैं, गंगा के लिए सबसे अधिक जरूरी है कि इसमें जल की निरंतरता बनी रहे। गर्मियों में भी जल छोड़ा जाना जरूरी है। बारिश से पहले इसकी सफाई की भी योजना बननी चाहिए। गंगा के साथ घाघरा, कोसी, गंडक आदि सहायक नदियों पर शोध करने वाले बॉटनी विभाग के डॉ.हरेंद्र सिंह कहते हैं, मैदानी इलाके में प्रवेश करने के साथ ही गंगा के बहाव में कमी आने लगती है। बलिया तक यही स्थिति बनी रहती है। यह समस्या कानपुर से इलाहाबाद के बीच सबसे अधिक है। संगम पर गंगा का पानी नहीं है। गंगा में जगह-जगह घुमाव है। नदी के किनारे का बड़ा हिस्सा खाली है। जल की निरंतरता के लिए जरूरी है कि पानी छोड़ने के साथ गाद निकालकर नदी का मूल स्वरूप वापस लाया जाए।
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नदी के कछारी तथा किनारे के खाली स्थानों में बारिश के पानी को रोका जाना जरूरी है। इसके लिए इन क्षेत्रों में ही जगह-जगह तालाब बनाए जाने चाहिए। छोटे-छोटे डैम बनाकर भी पानी रोका जा सकता है। पूर्व में इसकी योजना बनी भी थी लेकिन कुछ नहीं हुआ। नदी के किनारे पौधरोपण भी किया जाना चाहिए। इस पूरे अभियान में जिला प्रशासन, ग्रामीण पंचायतों को शामिल कर सकता है। इसमें बहुत बजट की भी जरूरत नहीं होगी। इन कामों के लिए जनवरी से जून तक का समय सबसे उपयुक्त होता है। बारिश शुरू होने के बाद नवंबर-दिसंबर तक गंगा की सफाई के बारे में सोचा नहीं जा सकता। इलाहाबाद के परिदृश्य में माघ मेले को देखते हुए मार्च से यह काम शुरू हो जाना चाहिए।
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गंगा में कितना जल है और कितना साफ है, दोनों बातों की सच्चाई कानपुर से इलाहाबाद के बीच में साफ देखी जा सकती है। इलाहाबाद में तो गंगा का मूल पानी ही नहीं बचा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी मुख्य वजह सही समय पर उचित कदम न उठाना है। गंगा में जल का बहाव निरंतर बना रहे, इसके लिए इसकी अविरलता जरूरी है। इसी तरह गंगा से गाद भी निकालनी होगी जिसके लिए यही एकदम उपयुक्त समय है क्योंकि इस समय गंगा में पानी कम है। विशेषज्ञों की सलाह है कि बारिश के पानी को रोकने के लिए कछारी इलाके में तालाब बनाए जाने चाहिए और पानी कम होने की वजह से इसके लिए भी यही सबसे उपयुक्त समय है। इस अभियान में ग्रामीणों और स्थानीय लोगों को भी जोड़ा जा सकता है।
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बीते तीन दशकों से अधिक समय से गंगा पर शोध कर रहे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बॉटनी विभाग के प्रोफेसर दीनानाथ शुक्ला कहते हैं, गंगा के लिए सबसे अधिक जरूरी है कि इसमें जल की निरंतरता बनी रहे। गर्मियों में भी जल छोड़ा जाना जरूरी है। बारिश से पहले इसकी सफाई की भी योजना बननी चाहिए। गंगा के साथ घाघरा, कोसी, गंडक आदि सहायक नदियों पर शोध करने वाले बॉटनी विभाग के डॉ.हरेंद्र सिंह कहते हैं, मैदानी इलाके में प्रवेश करने के साथ ही गंगा के बहाव में कमी आने लगती है। बलिया तक यही स्थिति बनी रहती है। यह समस्या कानपुर से इलाहाबाद के बीच सबसे अधिक है। संगम पर गंगा का पानी नहीं है। गंगा में जगह-जगह घुमाव है। नदी के किनारे का बड़ा हिस्सा खाली है। जल की निरंतरता के लिए जरूरी है कि पानी छोड़ने के साथ गाद निकालकर नदी का मूल स्वरूप वापस लाया जाए।
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नदी के कछारी तथा किनारे के खाली स्थानों में बारिश के पानी को रोका जाना जरूरी है। इसके लिए इन क्षेत्रों में ही जगह-जगह तालाब बनाए जाने चाहिए। छोटे-छोटे डैम बनाकर भी पानी रोका जा सकता है। पूर्व में इसकी योजना बनी भी थी लेकिन कुछ नहीं हुआ। नदी के किनारे पौधरोपण भी किया जाना चाहिए। इस पूरे अभियान में जिला प्रशासन, ग्रामीण पंचायतों को शामिल कर सकता है। इसमें बहुत बजट की भी जरूरत नहीं होगी। इन कामों के लिए जनवरी से जून तक का समय सबसे उपयुक्त होता है। बारिश शुरू होने के बाद नवंबर-दिसंबर तक गंगा की सफाई के बारे में सोचा नहीं जा सकता। इलाहाबाद के परिदृश्य में माघ मेले को देखते हुए मार्च से यह काम शुरू हो जाना चाहिए।