{"_id":"5e0cf3fa8ebc3e87ec800513","slug":"relief-for-advocate-registration-allahabad-news-ald2645401188","type":"story","status":"publish","title_hn":"पंजीयन के लिए अब मूलप्रमाण पत्र नहीं होंगे जमा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पंजीयन के लिए अब मूलप्रमाण पत्र नहीं होंगे जमा
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रयागराज। नए साल से अधिवक्ता पंजीकरण के लिए आवेदकों को अब अपने शैक्षिक प्रमाणपत्रों की मूल प्रतियां नहीं जमा करनी होंगी। केवल प्रोविजनल प्रमाणपत्र मूल रूप में लिया जाएगा। आवेदकों को शैक्षिक प्रमाणपत्रों की स्वप्रमाणित छाया प्रतियां हीं जमा करनी होंगी। प्रमाणपत्रों के सत्यापन के बाद ही पंजीकरण हो सकेगा। आवेदकों से 2500 रुपये सत्यापन शुल्क भी वसूल किया जाएगा। यह निर्णय बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर लिया है। इसे एक जनवरी 2020 से लागू कर दिया गया है।
अभी तक अधिवक्ता पंजीकरण के लिए आवेदकों को अपने शैक्षिक प्रमाणपत्रों की मूल प्रतियों को जमा करना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। आवेदकों को अपने शैक्षिक प्रमाणपत्रों की स्वप्रमाणित छायाप्रतियों को ही जमा करना होगा। इसके बाद उनके शैक्षिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराया जाएगा। सत्यापन के लिए आवेदकों से 2500 रुपये वसूल किए जाएंगे। हालांकि, अभी तक आवेदकों से सत्यापन शुल्क नहीं लिया जाता था। बार काउंसिल के चेयरमैन हरि शंकर सिंह का कहना है कि सत्यापन के दौरान यदि डिग्रियां गलत पाईं गईं तो ऐसे आवेदकों के खिलाफ कार्रवाई भी होगी।
चेयरमैन का कहना है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस संबंध में 2017 में ही निर्देश जारी किया था, लेकिन बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश की कार्यकारिणी भंग होने से यह निर्देश लागू नहीं हो सका। इस दौरान बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा गठित विशेष समिति अस्तित्व में थी। विशेष समिति ने इस निर्देश को लागू नहीं किया था। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस संबंध में दोबारा निर्देश जारी किया तो 14 दिसंबर 2019 को बैठक कर यह निर्णय लिया गया। नई व्यवस्था के मुताबिक एक जनवरी 2020 से पंजीयन के लिए जो भी आवेदक आएंगे, उनसे शैक्षिक प्रमाणपत्रों की मूल प्रति नहीं जमा कराई जाएगी। हालांकि, पिछले छह महीने के दौरान जबसे उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की विशेष समिति कार्य कर रही थी। उस दौरान अधिवक्ता पंजीयन के लिए जो भी आवेदन आए हैं, उस पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया से राय मांगी जाएगी और उसी के निर्देश पर कार्य किया जाएगा। विशेष समिति के कार्यावधि के दौरान अधिवक्ता पंजीयन के लिए जो भी आवेदन जमा हुए हैं, उस पर इस बात का निर्णय लिया जाना है कि क्या ऐसे आवेदकोें की मूल प्रतियों की जांच कर पंजीयन कर दिया जाए और उनसे 2500 रुपये शैक्षिक प्रमाणपत्रों की मूल प्रतियों के सत्यापन के लिए शुल्क न वसूल किया जाए।
विज्ञापन
अधिवक्ताओं का उत्पीड़न करने वाले
पुलिस अफसरों पर कार्रवाई की जाए
प्रयागराज। सीएए और एनआरसी को लेकर पुलिस द्वारा अधिवक्ताओं के किए जा रहे उत्पीड़न पर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन ने चिंता जताई है। उन्होंने मुख्यमंत्री व पुलिस महानिदेशक से अधिवक्ताओं का उत्पीड़न करने वाले पुलिस अफसरों पर कार्रवाई की मांग की है।
चेयरमैन ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश का सीएए और एनआरसी से कोई लेना देना नहीं है। प्रदेश में अधिवक्ता समाज के विभिन्न सदस्यों को स्थानीय पुलिस द्वारा अपने कारणों से इस तरह के आंदोलनों के पश्चात मुल्जिम बनाया जा रहा है और प्रताड़ित किया जा रहा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक ऐसे मामलों को संज्ञान लें और सही कदम उठाएं। उन्होंने जिला एवं तहसील बार एसोसिएशन के अधिवक्ताओं से हाईकोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा है कि वे न्यायालय परिसर में प्रवेश के समय सुरक्षाकर्मियों को अपना परिचय पत्र पूछने पर जरूर दिखाएं, उनसे उलझे नहीं। साथ ही डीएम और एसएसपी को पत्र भेजकर अधिवक्ताओं की सुरक्षा की मांग भी की है।
विज्ञापन
अभी तक अधिवक्ता पंजीकरण के लिए आवेदकों को अपने शैक्षिक प्रमाणपत्रों की मूल प्रतियों को जमा करना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। आवेदकों को अपने शैक्षिक प्रमाणपत्रों की स्वप्रमाणित छायाप्रतियों को ही जमा करना होगा। इसके बाद उनके शैक्षिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराया जाएगा। सत्यापन के लिए आवेदकों से 2500 रुपये वसूल किए जाएंगे। हालांकि, अभी तक आवेदकों से सत्यापन शुल्क नहीं लिया जाता था। बार काउंसिल के चेयरमैन हरि शंकर सिंह का कहना है कि सत्यापन के दौरान यदि डिग्रियां गलत पाईं गईं तो ऐसे आवेदकों के खिलाफ कार्रवाई भी होगी।
विज्ञापन
चेयरमैन का कहना है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस संबंध में 2017 में ही निर्देश जारी किया था, लेकिन बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश की कार्यकारिणी भंग होने से यह निर्देश लागू नहीं हो सका। इस दौरान बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा गठित विशेष समिति अस्तित्व में थी। विशेष समिति ने इस निर्देश को लागू नहीं किया था। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस संबंध में दोबारा निर्देश जारी किया तो 14 दिसंबर 2019 को बैठक कर यह निर्णय लिया गया। नई व्यवस्था के मुताबिक एक जनवरी 2020 से पंजीयन के लिए जो भी आवेदक आएंगे, उनसे शैक्षिक प्रमाणपत्रों की मूल प्रति नहीं जमा कराई जाएगी। हालांकि, पिछले छह महीने के दौरान जबसे उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की विशेष समिति कार्य कर रही थी। उस दौरान अधिवक्ता पंजीयन के लिए जो भी आवेदन आए हैं, उस पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया से राय मांगी जाएगी और उसी के निर्देश पर कार्य किया जाएगा। विशेष समिति के कार्यावधि के दौरान अधिवक्ता पंजीयन के लिए जो भी आवेदन जमा हुए हैं, उस पर इस बात का निर्णय लिया जाना है कि क्या ऐसे आवेदकोें की मूल प्रतियों की जांच कर पंजीयन कर दिया जाए और उनसे 2500 रुपये शैक्षिक प्रमाणपत्रों की मूल प्रतियों के सत्यापन के लिए शुल्क न वसूल किया जाए।
विज्ञापन
अधिवक्ताओं का उत्पीड़न करने वाले
पुलिस अफसरों पर कार्रवाई की जाए
प्रयागराज। सीएए और एनआरसी को लेकर पुलिस द्वारा अधिवक्ताओं के किए जा रहे उत्पीड़न पर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन ने चिंता जताई है। उन्होंने मुख्यमंत्री व पुलिस महानिदेशक से अधिवक्ताओं का उत्पीड़न करने वाले पुलिस अफसरों पर कार्रवाई की मांग की है।
चेयरमैन ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश का सीएए और एनआरसी से कोई लेना देना नहीं है। प्रदेश में अधिवक्ता समाज के विभिन्न सदस्यों को स्थानीय पुलिस द्वारा अपने कारणों से इस तरह के आंदोलनों के पश्चात मुल्जिम बनाया जा रहा है और प्रताड़ित किया जा रहा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक ऐसे मामलों को संज्ञान लें और सही कदम उठाएं। उन्होंने जिला एवं तहसील बार एसोसिएशन के अधिवक्ताओं से हाईकोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा है कि वे न्यायालय परिसर में प्रवेश के समय सुरक्षाकर्मियों को अपना परिचय पत्र पूछने पर जरूर दिखाएं, उनसे उलझे नहीं। साथ ही डीएम और एसएसपी को पत्र भेजकर अधिवक्ताओं की सुरक्षा की मांग भी की है।