Health Tips : खाना दोबारा गर्म करके खाना जहर जैसा, बासी भोजन शरीर के लिए बेहद हानिकारक
कोरोना एक जुकाम है जिस पर आयुर्वेद पूरी तरह से नियंत्रण पा सकता है। इसका जड़ से खात्मा आयुर्वेद में ही संभव है। उन्होंने पुरानी सर्दी, जुकाम आदि बीमारियों को पल भर में ठीक करने का दावा भी किया।
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उत्तराखंड से आए पद्मश्री वैद्य बालेंदु ने अपनी दिनचर्या पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी है। उनका कहना है कि हमें नियमित रूप से समय से ही खाना चाहिए। खाने के लिए लेटलतीफी ठीक नहीं है। ऐसा करने से शरीर हमेशा सेहतमंद रखेगा। ध्यान रहे, खाना दोबारा गर्म करके खाना तो जहर जैसा है। कभी भी खाना गर्म करके या बासी खाने से बचें।
शनिवार को प्रेस क्लब में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने आयुर्वेद पद्धति से इलाज को एतिहासिक और कारगर बताया।
कहा, कोरोना एक जुकाम है जिस पर आयुर्वेद पूरी तरह से नियंत्रण पा सकता है। इसका जड़ से खात्मा आयुर्वेद में ही संभव है। उन्होंने पुरानी सर्दी, जुकाम आदि बीमारियों को पल भर में ठीक करने का दावा भी किया। कहा, मैंने जो भी दवाएं बनाई हैं, पहले स्वयं उसका सेवन किया है। इसी क्रम में उन्होंने ब्लड कैंसर जैसी बड़ी बीमारी के भी आयुर्वेद से इलाज का दावा किया। बातचीत के दौरान नीमा के अध्यक्ष डॉ. एसके राय, सचिव डॉ.अरविंद मिश्रा, रोटरी क्लब संगम के अध्यक्ष अमित त्रिपाठी,वैद्य ऋषि अग्रवाल आदि मौजूद थे।
पुराने रोगों का नि:शुल्क इलाज एमएनएनआईटी में गोष्ठी आज
रोटरी क्लब के सहयोग से रविवार को सिविल लाइंस स्थित जगोत्तम आयुर्वेद व पंचकर्म सेंटर में सुबह दस बजे से दिन में दो बजे तक विशेष स्वास्थ्य शिविर आयोजित किया जाएगा। इसमें पद्मश्री डॉ.बालेंदु प्रकाश की देखरेख में मरीजों का नि:शुल्क उपचार किया जाएगा। इसके बाद डॉ.बालेंदु दिन में दो बजे से एमएनएनआईटी सभागार में आजादी का अमृत महोत्सव के तहत ‘एविडेंस बेस्ड आयुर्वेद’ विषयक गोष्ठी में विचार व्यक्त करेंगे।
कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एसपी केसरवानी के अतिरिक्त एमएनएनआईटी के निदेशक प्रो.आरएस वर्मा, प्रो.केएन द्विवेदी, डॉ.जीएस तोमर, नीमा अध्यक्ष डॉ.एसके राय, सेंट्रल सेक्रेटरी डॉ.यूएस पांडेय आदि शाुमिल होंगे।
ब्लड कैंसर पर विशेष शोध के लिए मिली पद्मश्री
उत्तराखंड के वैद्य बालेंदु ने 1997 में एक्यूट प्रोमाइलोसिटिक ल्यूकेमिया (एक तरह का ब्लड कैंसर) के उपचार के लिए आयुर्वेदिक दवा पर शोध किया था। इस गंभीर बीमारी में प्लेटलेट्स की कमी और ब्लीडिंग से ज्यादातर मरीजों की मौत हो जाती है। उनके पिता ने 1982 में उस दवा से एक बच्चे का उपचार किया था, जो अब भी जीवित है। वैद्य बालेंदु ने भी उसी दवा से कई मरीजों का उपचार किया।
फिर उनके अनुरोध पर सरकार ने उनके शोध प्रोजेक्ट को मंजूरी देते हुए 3.30 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत करते हुए 15 मरीजों का उपचार करने को कहा। 90 दिनों के उपचार के दौरान चार मरीजों की मौत हो गई, लेकिन जिन 11 मरीजों ने 90 दिन का उपचार करवाया, वह सभी जीवित रहे। उनके इसी शोध को लेकर उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।