शिक्षा के गिरते स्तर से बढ़ा कोचिंग का कारोबार
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एसोचैम की हालिया रिपोर्ट ने तो सरकार तथा शैक्षिक नीति निर्धारण करने वालों के सामने नई चुनौती रख दी है। इसमें कहा गया है कि कोचिंग संस्थानों का वार्षिक कारोबार एक लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है और 35 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। कोचिंग के कारोबार में इस अप्रत्याशित बढ़ोतरी के पीछे स्कूली और उच्च शिक्षा में लगातार गिरावट को प्रमुख का कारण माना जा रहा है।
शिक्षाविदों का स्पष्ट कहना है कि कालेजों में पढ़ाई न होने की वजह से विद्यार्थी कोचिंग संस्थानों में जाने के लिए विवश हैं। बिना मानक के निजी संस्थान खोले जा रहे हैं तो सरकारी तथा अनुदान प्राप्त स्कूलों और कालेजों में शिक्षकों की भारी कमी है। उच्च शिक्षण संस्थानों में 70 फीसदी पद खाली हैं। जो शिक्षक हैं उनमें भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो अपना 100 फीसदी देने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में पूरी शिक्षा व्यवस्था पंगु हो गई है और इन परिस्थितियों में परीक्षा प्रारूप में बदलावों से कोचिंग के कारोबार पर अंकुश लगने के बजाय उल्टा बढ़ेगा।
कानपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति तथा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष और नेहरू ग्राम भारती विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर केबी पांडेय मानते हैं कि इस समय स्कूलों और कालेजों की जो स्थिति है उसमें विद्यार्थियों के सामने कोचिंग के अलावा कोई विकल्प नहीं है। शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से डगमगा गई है। स्थिति यह है कि छात्र-छात्रा स्कूल और कालेजों के बजाय कोचिंग को तवज्जो दे रहे हैं। यही वजह है कि स्कूलाें में उपस्थिति घट रही है। कोचिंग के कारोबार पर अंकुश के लिए ही नहीं, युवाओं के बेहतर भविष्य के लिए भी शिक्षा में व्यापक सुधार की जरूरत है। इस पर चिंतन-मंथन जरूरी है। गुणवत्तापरक शिक्षा के लिए कई कदम भी उठाए गए हैं लेकिन अभी सकारात्मक परिणाम नहीं दिख रहे। सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।
उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय की शिक्षाविज्ञान शाखा के निदेशक प्रोफेसर एसपी गुप्ता का कहना है कि निजी संस्थानों में गुणवत्तापरक शिक्षा नहीं है। कई संस्थान सिर्फ डिग्री बांटने के लिए खुले हैं। पढ़ाई नहीं होती। सरकारी और अनुदान प्राप्त शिक्षण संस्थानों की शिक्षा में लगातार गिरावट आई है। शिक्षकों की कमी से स्थिति बिगड़ गई है। आज का दौर कंप्टीशन का है। प्रवेश से लेकर नौकरी के लिए परीक्षा देनी होती है। इसलिए छात्र-छात्राओं के लिए कोचिंग में जाना विवशता है। सरकार के साथ शिक्षा से जुड़े अन्य सभी लोगाें को इस बारे में सोचना होगा।
कोचिंग संस्थानों की बढ़ती संख्या को देखते हुए एक बार तो इन्हें मान्यता देने पर विचार होने लगा था। प्रोफेसर केबी पांडेय कहते हैं, स्कूलों और कालेजों में पढ़ाई लगातार सवालों के घेरे में है। इसकी वजह से विद्यार्थी कोचिंग संस्थानों में जाने के बाध्य हुए। ऐसे में एक वर्ग ऐसा सामने आया जो कोचिंग संस्थानाें को मान्यता देने की वकालत कर रहा था। अच्छे कोचिंग संस्थान को मान्यता देकर उनके विद्यार्थियों को बोर्ड तथा यूनिवर्सिटी की परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए।
कोचिंग के बढ़ते कारोबार के पीछे भर्ती परीक्षाओं में उनकी सेंधमारी भी एक कारण है। चिंताजनक बात यह है कि कोचिंग का कारोबार करने वालों में एक वर्ग ऐसा है जो पूरी भर्ती प्रक्रिया को हाईजैक करने में सक्षम है। कर्मचारी चयन आयोग, बैंक आदि संस्थाआें की भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक तथा बड़े स्तर पर नकल के मामलों में कोचिंग संस्थानों की मुख्य भूमिका सामने आई है। वे मोटी रकम के एवज में नौकरी की गारंटी देते हैं। इससे भी इनमें काफी भीड़ है।