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अंक छिपाने पर घिरा आयोग

Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Thu, 01 Oct 2020 12:48 AM IST
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उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) के अफसरों को शायद आभास हो गया था कि आने वाले दिनों में पीसीएस चयन में यूपी के छात्रों का ग्राफ तेजी से गिरने जा रहा है। अभ्यर्थियों का मानना है कि इसी वजह से आयोग ने वर्ष 2002 से स्केल्ड और नॉन स्केल्ड अंक दिए जाने की व्यवस्था में बिना किसी ठोस कारण के अचानक परिवर्तन कर दिया अैर पीसीएस-2016 से अभ्यर्थियों के नॉन स्केल्ड अंक बताने बंद कर दिए।
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स्केल्ड अंक से तात्पर्य अभ्यर्थी को मिले वास्तविक अंकों से है और नॉन स्केल्ड अंक का मतलब है कि स्केलिंग के बाद अभ्यर्थी को कितने अंक मिले। यह व्यवस्था वर्ष 2002 से लागू थी। इसमें परिवर्तन से अभ्यर्थियों में काफी नाराजगी है। इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं। मार्कशीट में पहले स्केल्ड और नॉन स्केल्ड अंक प्रदर्शित किए जाते थे। इससे अभ्यर्थियों को पता चल जाता था कि गणित और विज्ञान के छात्रों को स्केलिंग का कितना फायदा और नुकसान हुआ। साथ ही मानविकी में किस विषय के अभ्यर्थी को स्केलिंग के बाद कितने अंक मिले, यह भी आसानी से मालूम हो जाता था। लेकिन, पीसीएस-2016 से मार्कशीट में केवल स्केल्ड अंक बताए जाने की व्यवस्था लागू कर दी गई है। यानी अभ्यर्थियों को यह तो पता चल जाएगा कि स्केलिंग के बाद उन्हें कितने अंक मिले लेकिन यह नहीं मालूम होगा कि उनके कितने वास्तविक अंक हैं।

पीसीएस-2018 में उत्तर प्रदेश से बाहर के अभ्यर्थियों का बड़े पैमाने पर चयन होने के बाद यह मुद्दा फिर गरमा गया है। अभ्यर्थी लगातार आरोप लगा रहे हैं कि अंग्रेजी माध्यम और विज्ञान वर्ग वालों को फायदा और हिंदी माध्यम और मानविकी विषयों के अभ्यर्थियों को नुकसान हुआ है। लेकिन, सवाल यह है कि जब आयोग स्केल्ड यानी वास्तविक अंक बताएगा ही नहीं तो कैसे पता चलेगा कि स्केलिंग में किसे फायदा या नुकसान हुआ। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के मीडिया प्रभारी अवनीश पांडेय का कहना है कि उन्होंने आयोग अध्यक्ष का एक इंटरव्यू देखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि समस्या में ही समाधान निहित है। छात्र आयोग के लिए समस्या न बनें, सो समाधान के रूप में नॉन स्केल्ड अंकों की जानकारी देनी ही बंद कर दी गई। पारदर्शिता का दावा करने वाले आयोग को इस मसले पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। कम से कम यह तो जरूर बताना चाहिए कि अचानक इस परिवर्तन की क्या जरूरत पड़ गई।
स्केलिंग का मुद्दा आयोग के लिए पहले भी बवाल बन चुका है। पीसीएस-2011 के रिजल्ट से असंतुष्ट अभ्यर्थियों ने इस मुद्दे पर प्रदेश व्यापी आंदोलन चलाया था। आरोप लगे थे कि आयोग ने एक जाति विशेष के अभ्यर्थियों को स्केलिंग की आड़ में काफी अधिक अंक दे दिए और इस वजह से बड़े पैमाने पर उनका चयन हो गया। इस बवाल के बाद आयोग ने मार्कशीट देखने के लिए ओटीपी की व्यवस्था लागू कर दी थी। हालांकि अभ्यर्थियों ने इसका तोड़ भी खोज लिया था और रजिस्ट्रेशन नंबर से दूसरे अभ्यर्थियों के अंक पता लगाने की तरकीब निकाल ली थी।
आयोग ने पीसीएस-2017 की मार्कशीट एवं कटऑफ अंक अब तक जारी नहीं किए हैं। जबकि, चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति भी मिल चुकी है। अभ्यर्थियों को मुख्य रूप से पीसीएस-2018 की मार्कशीट जारी होने का इंतजार है, जिसका रिजल्ट कई दिनों पहले आया है। अभ्यर्थी दावा कर रहे हैं कि पीसीएस-2018 में स्केलिंग लागू नहीं की गई। इसी वजह से बड़ी संख्या में हिंदी माध्यम एवं मानविकी विषय के साथ परीक्षा में शामिल होने वाले उत्तर प्रदेश के अभ्यर्थी छंटकर बाहर हो गए। मार्कशीट जारी होने के बाद स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी।

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