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प्रयागराज में परिवारवाद को नहीं मिला प्रश्रय
Fri, 15 Mar 2019 01:09 AM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 15 Mar 2019 01:09 AM IST
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- फोटो : प्रयागराज
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भारतीय राजनीति में परिवारवाद को लेकर बहस छिड़ी हुई है तो प्रयागराज में भी कई दिग्गज अपने पुत्र के लिए या खुद को टिकट के लिए ताल ठोकते दिखाई दे रहे हैं। मौजूदा समय में जिस दल में हैं, उसके अलावा दूसरी पार्टियाें में भी संभावनाएं तलाश रहे हैं लेकिन इतिहास बताता है कि इलाहाबाद के लोगों ने वंशवाद को हमेशा नकार दिया है। विजय लक्ष्मी पंडित, हरिकृष्ण शास्त्री, मसुरियादीन के पुत्र शशि प्रकाश के बाद विरासत की राजनीति को इलाहाबाद के लोगों ने नकारा ही है। एक-दो उदाहरण को छोड़ दें तो ज्यादातर को यहां हार का मुंह देखना पड़ा या दूसरे जिलों की राह पकड़नी पड़ी।
लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। कई दिग्गज प्रमुख दलों से टिकट के लिए दावेदारी ठोक चुके हैं। इनमें उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के पुत्र योगेश, पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेंद्र कुमारी बाजपेई के पुत्र अशोक बाजपेई, सांसद श्यामा चरण के पुत्र विदुप, रेवती रमण के पुत्र उज्ज्वल रमण समेत कई ऐसे हैं जो विरासत की राजनीति को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। इनके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र अनिल शास्त्री, नाती और कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा की पुत्री कैबिनेट मंत्री डॉ.रीता बहुगुणा जोशी की भी इलाहाबाद या फूलपुर से उम्मीदवारी की चर्चा जोरों पर है।
इससे अलग आजादी के बाद के शुरुआती चुनावों को छोड़ दें तो यहां के मतदाताओं ने विरासत की राजनीति को बहुत पसंद नहीं किया। फूलपुर से पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित दो बार सांसद चुनी गईं लेकिन, उनके बाद उस परिवार से कोई यहां से चुनाव नहीं लड़ा। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अमेठी चली गईं तो उनके बाद पुत्र राजीव गांधी, संजय गांधी, बहू सोनिया गांधी तथा पोते राहुल गांधी अमेठी और रायबरेली से चुनाव लड़ते रहे। हालांकि , इंदिरा गांधी की पोती प्रियंका गांधी को फूलपुर की विरासत सौंपने की छटपटाहट कांग्रेस कार्यकर्ताओं में लंबे समय से दिखाई दे रही है।
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लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र हरिकृष्ण शास्त्री भी इलाहाबाद से एक बार संसद पहुंचने में सफल रहे लेकिन, उनके भाई अनिल शास्त्री और सुनील शास्त्री चुनाव नहीं जीत पाए। हरिकृष्ण शास्त्री भी फतेहपुर चले गए। पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा की पुत्री डॉ.रीता बहुगुणा ने लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव भी लड़ा लेकिन, सफलता नहीं मिली। हालांकि यहां से मेयर चुनी गईं थीं। वह इन दिनों कैबिनेट मंत्री हैं लेकिन लखनऊ से विधायक हैं। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के पुत्र अजेय सिंह ने भी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश की मगर संभावना न बनता देख फतेहपुर से लोकसभा चुनाव लड़े।
हालांकि वहां भी वह जीत नहीं सके। राजेंद्र कुमारी के पुत्र अशोक बाजपेई भी लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव लड़े लेकिन सिर्फ एक बार विधानसभा पहुंचने में सफल रहे। अब वह एक बार फिर टिकट के दावेदारों में शामिल हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री धर्मवीर के पुत्र शैलेंद्र, पूर्व मंत्री सालिकराम जायसवाल के पुत्र सतीश अग्रवाल समेत कई अन्य नेता भी रहे जिनके पुत्र तथा परिवार के अन्य सदस्य विधायक या सांसद चुने गए लेकिन उनका सियासी सफर बहुत आगे नहीं बढ़ा। हालांकि शैलेंद्र अभी सांसद हैं चायल से दावेदार बताए जा रहे हैं।
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लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। कई दिग्गज प्रमुख दलों से टिकट के लिए दावेदारी ठोक चुके हैं। इनमें उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के पुत्र योगेश, पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेंद्र कुमारी बाजपेई के पुत्र अशोक बाजपेई, सांसद श्यामा चरण के पुत्र विदुप, रेवती रमण के पुत्र उज्ज्वल रमण समेत कई ऐसे हैं जो विरासत की राजनीति को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। इनके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र अनिल शास्त्री, नाती और कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा की पुत्री कैबिनेट मंत्री डॉ.रीता बहुगुणा जोशी की भी इलाहाबाद या फूलपुर से उम्मीदवारी की चर्चा जोरों पर है।
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इससे अलग आजादी के बाद के शुरुआती चुनावों को छोड़ दें तो यहां के मतदाताओं ने विरासत की राजनीति को बहुत पसंद नहीं किया। फूलपुर से पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित दो बार सांसद चुनी गईं लेकिन, उनके बाद उस परिवार से कोई यहां से चुनाव नहीं लड़ा। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अमेठी चली गईं तो उनके बाद पुत्र राजीव गांधी, संजय गांधी, बहू सोनिया गांधी तथा पोते राहुल गांधी अमेठी और रायबरेली से चुनाव लड़ते रहे। हालांकि , इंदिरा गांधी की पोती प्रियंका गांधी को फूलपुर की विरासत सौंपने की छटपटाहट कांग्रेस कार्यकर्ताओं में लंबे समय से दिखाई दे रही है।
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लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र हरिकृष्ण शास्त्री भी इलाहाबाद से एक बार संसद पहुंचने में सफल रहे लेकिन, उनके भाई अनिल शास्त्री और सुनील शास्त्री चुनाव नहीं जीत पाए। हरिकृष्ण शास्त्री भी फतेहपुर चले गए। पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा की पुत्री डॉ.रीता बहुगुणा ने लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव भी लड़ा लेकिन, सफलता नहीं मिली। हालांकि यहां से मेयर चुनी गईं थीं। वह इन दिनों कैबिनेट मंत्री हैं लेकिन लखनऊ से विधायक हैं। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के पुत्र अजेय सिंह ने भी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश की मगर संभावना न बनता देख फतेहपुर से लोकसभा चुनाव लड़े।
हालांकि वहां भी वह जीत नहीं सके। राजेंद्र कुमारी के पुत्र अशोक बाजपेई भी लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव लड़े लेकिन सिर्फ एक बार विधानसभा पहुंचने में सफल रहे। अब वह एक बार फिर टिकट के दावेदारों में शामिल हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री धर्मवीर के पुत्र शैलेंद्र, पूर्व मंत्री सालिकराम जायसवाल के पुत्र सतीश अग्रवाल समेत कई अन्य नेता भी रहे जिनके पुत्र तथा परिवार के अन्य सदस्य विधायक या सांसद चुने गए लेकिन उनका सियासी सफर बहुत आगे नहीं बढ़ा। हालांकि शैलेंद्र अभी सांसद हैं चायल से दावेदार बताए जा रहे हैं।