सूबे के निजी स्कूलों में सिर्फ 2817 गरीब बच्चे
सूबे में चल रहे निजी शिक्षण संस्थानों को कानूनी प्रावधानों की परवाह नहीं है। यही कारण है निजी स्कूल आरटीई एक्ट के मानक के विपरीत 25 प्रतिशत आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को दाखिला नहीं दे रहे हैं। मौजूदा समय में मात्र 2817 गरीब बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं, जबकि पूरे प्रदेश मेें कक्षा एक में पंजीकृत छात्रों की संख्या 56.53 लाख है। नियमानुसार कुल पंजीकृत छात्रों की संख्या का 25 प्रतिशत आर्थिक रूप से पिछड़े (ईडब्ल्यूएस) छात्रों को निजी स्कूलों में दाखिला मिलना चाहिए। हाईकोर्ट में दाखिल जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आए।
अजय कुमार पटेल ने याचिका दाखिल कर कहा है कि आरटीई एक्ट की धारा 12(1)(सी) के प्रावधानों का पालन नहीं हो रहा है। निजी स्कूल गरीब बच्चों का दाखिला नहीं ले रहे हैं और न ही बेसिक शिक्षा अधिकारियों द्वारा इस दिशा में कोई प्रयास होता है। याचिका में तीन दिसंबर 2012 और छह जनवरी 2015 के शासनादेशों का हवाला देकर कहा गया है कि इन शासनादेशों में कहा गया है कि जहां सरकारी स्कूलों में सीट खाली न हो सिर्फ वहां पर बच्चों का दाखिला निजी स्कूलों में कराया जाए।
याचिका में गरीब बच्चों के वार्ड वार चिह्नित करने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। कहा गया कि यह व्यवस्था मात्र शहरी क्षेत्रों में लागू है। ग्रामीण क्षेत्रों में वार्ड चिह्नित कर गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिल दिलाने की व्यवस्था नहीं है। इससे ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले बच्चे इस प्रावधान के लाभ से वंचित रह जाते हैं। मुख्य न्यायाधीश डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने इसे गंभीर मामला मानते हुऐ प्रदेश सरकार को एक माह के भीतर संक्षिप्त हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। याचिका पर 24 फरवरी को अगली सुनवाई होगी।