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रेलवे फ्रेट कॉरिडोर के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ याचिकाएं खारिज
Sat, 04 Sep 2021 09:23 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sat, 04 Sep 2021 09:23 PM IST
सार
याचिका में 11 फरवरी 2019 को रेलवे एक्ट की धारा 20 ए और धारा 20 ई के तहत प्रकाशित अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। मांग की गई कि उक्त सूचनाओं को रद्द किया जाए।
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allahabad high court
- फोटो : social media
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर व ग्रेटर नोएडा में रेलवे के डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर निर्माण के लिए अधिग्रहित भूमि के खिलाफ याचिका खारिज कर दी है। मगर कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह याची गण को वर्तमान बाजार मूल्य के अनुसार मुआवजे का भुगतान करें तथा राज्य सरकार से कहा है कि वह उन दोषी अधिकारियों के खिलाफ जांच करें जिन्होंने केंद्र सरकार को इस बात की गलत रिपोर्ट प्रेषित की कि याची गण की ओर से मुआवजे के निर्धारण को लेकर के कोई आपत्ति नहीं की गई। जय वीर सिंह व अन्य सहित किसानों की ओर से दाखिल चार याचिकाओं पर न्यायमूर्ति मनोज मिश्र और दिनेश पाठक की पीठ ने यह आदेश दिया है।
याचिका में 11 फरवरी 2019 को रेलवे एक्ट की धारा 20 ए और धारा 20 ई के तहत प्रकाशित अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। मांग की गई कि उक्त सूचनाओं को रद्द किया जाए। याचीगण का कहना था की रेलवे ने डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के लिए भूमि अधिग्रहण हेतु अधिसूचना प्रकाशित की थी। भूमि का अर्जन हो जाने के बाद ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी की मांग पर और भूमि के अधिग्रहण के लिए उपरोक्त तिथियों पर अधिसूचना प्रकाशित की गई। याची गण ने मुआवजे का निर्धारण को लेकर अपनी आपत्ति दाखिल की मगर उनको सुने बिना यह रिपोर्ट भेज दी गई कि किसी ने कोई आपत्ति नहीं की है। जबकि रेलवे का कहना था की परियोजना राष्ट्रीय महत्व की है ।
इसके लिए 824 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। जिसमें से 614 करोड़ों रुपए का काम हो चुका है तथा मात्र 1.36 किलोमीटर का काम ही शेष है कुल 54.38 किलोमीटर का कॉरिडोर बनाया जाना है। कोर्ट ने कहा की याचीगण ने समय सीमा के भीतर आपत्ति दाखिल की थी। मगर उस पर सुनवाई किए बिना या गलत रिपोर्ट दी गई कि किसी ने कोई आपत्ति नहीं की है। वर्तमान स्थिति में जबकि प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो चुका है। अधिसूचना को रद्द करने से जनता के पैसे का भारी नुकसान होगा तथा प्रोजेक्ट को फिर से बनाना पड़ेगा। इस स्थिति में कोर्ट ने अधिसूचना रद्द करने से इंकार कर दिया। मगर केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि याची गण को वर्तमान बाजार मूल्य से मुआवजा दिया जाए और उन अधिकारियों की जांच की जाए जिन्होंने इस बात की गलत रिपोर्ट दी कि समय सीमा के भीतर याची गण ने अपनी आपत्ति दाखिल नहीं की थी। कोर्ट ने इस आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को जांच के लिए भेजने का निर्देश दिया है।
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याचिका में 11 फरवरी 2019 को रेलवे एक्ट की धारा 20 ए और धारा 20 ई के तहत प्रकाशित अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। मांग की गई कि उक्त सूचनाओं को रद्द किया जाए। याचीगण का कहना था की रेलवे ने डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के लिए भूमि अधिग्रहण हेतु अधिसूचना प्रकाशित की थी। भूमि का अर्जन हो जाने के बाद ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी की मांग पर और भूमि के अधिग्रहण के लिए उपरोक्त तिथियों पर अधिसूचना प्रकाशित की गई। याची गण ने मुआवजे का निर्धारण को लेकर अपनी आपत्ति दाखिल की मगर उनको सुने बिना यह रिपोर्ट भेज दी गई कि किसी ने कोई आपत्ति नहीं की है। जबकि रेलवे का कहना था की परियोजना राष्ट्रीय महत्व की है ।
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इसके लिए 824 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। जिसमें से 614 करोड़ों रुपए का काम हो चुका है तथा मात्र 1.36 किलोमीटर का काम ही शेष है कुल 54.38 किलोमीटर का कॉरिडोर बनाया जाना है। कोर्ट ने कहा की याचीगण ने समय सीमा के भीतर आपत्ति दाखिल की थी। मगर उस पर सुनवाई किए बिना या गलत रिपोर्ट दी गई कि किसी ने कोई आपत्ति नहीं की है। वर्तमान स्थिति में जबकि प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो चुका है। अधिसूचना को रद्द करने से जनता के पैसे का भारी नुकसान होगा तथा प्रोजेक्ट को फिर से बनाना पड़ेगा। इस स्थिति में कोर्ट ने अधिसूचना रद्द करने से इंकार कर दिया। मगर केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि याची गण को वर्तमान बाजार मूल्य से मुआवजा दिया जाए और उन अधिकारियों की जांच की जाए जिन्होंने इस बात की गलत रिपोर्ट दी कि समय सीमा के भीतर याची गण ने अपनी आपत्ति दाखिल नहीं की थी। कोर्ट ने इस आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को जांच के लिए भेजने का निर्देश दिया है।
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