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मृतक आश्रित को 10 लाख रुपये देने का आदेश
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 30 Dec 2017 01:32 AM IST
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अदालत।
- फोटो : amar ujala
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भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) में मृतक आश्रित कोटा के तहत नौकरी के लिए आवेदन करने वाले विद्या प्रसाद को राहत मिली है। इलाहाबाद निगम के मुख्य महाप्रबंधक (सीजीएम) लखनऊ को मृतक आश्रित को 10 लाख रुपये के भुगतान का निर्देश दिया गया है। भुगतान तीन महीने में करना है। तीन महीने में भुगतान न करने पर छह फीसदी ब्याज के साथ राशि वसूली जाएगी। न्यायालय ने यह आदेश नियुक्ति देने में देरी करने के चलते आश्रित की उम्र 50 साल बीत जाने के कारण दिया है। कोर्ट ने कैट के फैसले में हस्तक्षेप से भी इंकार कर दिया। विभाग का कहना था कि 50 साल की आयु के बाद नियुक्ति नहीं की जा सकती ।
यह आदेश न्यायमूर्ति रणविजय सिंह तथा न्यायमूर्ति नीरज तिवारी की खंडपीठ ने बीएसएनएल के मुख्य महाप्रबंधक लखनऊ की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण इलाहाबाद के विपक्षी विद्या प्रसाद को मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति देने के आदेश पर हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि विभाग ने नियुक्ति पर विचार करने में दो वर्ष की देरी की और नये नियम के आधार पर नियुक्ति निरस्त कर दिया। जबकि, कर्मचारी की मृत्यु के समय के नियम के तहत विचार करना चाहिए था ।
कोर्ट ने कहा है कि आश्रित की आयु 50 साल से अधिक हो गई है। यदि उसे खाली हाथ लौट जाने दिया गया तो इस लंबी कानूनी लड़ाई का कोई मतलब नहीं रह जाएगा और न्यायपालिका के प्रति लोगों का विश्वास कम होगा। कोर्ट ने कहा कि यदि आश्रित को तीन माह में 10 लाख नहीं मिलते तो विभाग से 6 फीसदी ब्याज के साथ धन राशि वसूल की जाए। विपक्षी अधिवक्ता का कहना था कि विद्या प्रसाद के पिता लाइनमैन के पद पर कार्यरत थे। सात फरवरी 2003 को सेवा काल में उनकी मृत्यु हो गई। आश्रित ने नियुक्ति की मांग में अर्जी दाखिल किया, जिसकी खामियों को दुरुस्त करने के बाद अर्जी निरस्त करने मे दो साल बिता दिए गए। निगम ने नए नियम के आधार पर आवेदक की आयु 50 वर्ष पूरी होने के कारण नियुक्ति करने से इंकार कर दिया, जिसे कैट इलाहाबाद में चुनौती दी गई। कैट ने आश्रित कोटे में नियुक्ति का निर्देश दिया। कैट के इस आदेश को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कैट के आदेश को सही माना। चूंकि विपक्षी की आयु 50 साल से अधिक हो गई थी। इसलिए विभाग को आदेश दिया कि वह आश्रित को 10 दश लाख रुपये का भुगतान करे। निगम की तरफ से अधिवक्ता सुबोध कुमार ने बहस की।
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यह आदेश न्यायमूर्ति रणविजय सिंह तथा न्यायमूर्ति नीरज तिवारी की खंडपीठ ने बीएसएनएल के मुख्य महाप्रबंधक लखनऊ की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण इलाहाबाद के विपक्षी विद्या प्रसाद को मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति देने के आदेश पर हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि विभाग ने नियुक्ति पर विचार करने में दो वर्ष की देरी की और नये नियम के आधार पर नियुक्ति निरस्त कर दिया। जबकि, कर्मचारी की मृत्यु के समय के नियम के तहत विचार करना चाहिए था ।
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कोर्ट ने कहा है कि आश्रित की आयु 50 साल से अधिक हो गई है। यदि उसे खाली हाथ लौट जाने दिया गया तो इस लंबी कानूनी लड़ाई का कोई मतलब नहीं रह जाएगा और न्यायपालिका के प्रति लोगों का विश्वास कम होगा। कोर्ट ने कहा कि यदि आश्रित को तीन माह में 10 लाख नहीं मिलते तो विभाग से 6 फीसदी ब्याज के साथ धन राशि वसूल की जाए। विपक्षी अधिवक्ता का कहना था कि विद्या प्रसाद के पिता लाइनमैन के पद पर कार्यरत थे। सात फरवरी 2003 को सेवा काल में उनकी मृत्यु हो गई। आश्रित ने नियुक्ति की मांग में अर्जी दाखिल किया, जिसकी खामियों को दुरुस्त करने के बाद अर्जी निरस्त करने मे दो साल बिता दिए गए। निगम ने नए नियम के आधार पर आवेदक की आयु 50 वर्ष पूरी होने के कारण नियुक्ति करने से इंकार कर दिया, जिसे कैट इलाहाबाद में चुनौती दी गई। कैट ने आश्रित कोटे में नियुक्ति का निर्देश दिया। कैट के इस आदेश को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कैट के आदेश को सही माना। चूंकि विपक्षी की आयु 50 साल से अधिक हो गई थी। इसलिए विभाग को आदेश दिया कि वह आश्रित को 10 दश लाख रुपये का भुगतान करे। निगम की तरफ से अधिवक्ता सुबोध कुमार ने बहस की।
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