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यौन शोषण के मामले में जरूरी नहीं विस्तृत जांच

Thu, 19 Feb 2015 11:42 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद Updated Thu, 19 Feb 2015 11:42 PM IST
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Not necessarily detailed investigation into sexual abuse case
हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यौन उत्पीड़न के प्रकरण में आरोपी के विरुद्ध कार्रवाई करने हेतु विस्तृत जांच जरूरी नहीं है। आरोपी को रिपोर्ट की कॉपी देना या गवाहों की प्रतिपरीक्षा कराना ऐसे प्रकरण में आवश्यक नहीं होता, क्योंकि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत हर दशा में एक जैसे नहीं होते। आईआईटी बीएचयू के यौन उत्पीड़न के आरोपी प्रोफेसर की याचिका पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति दिलीप गुप्ता और न्यायमूर्ति अंजनी कुमार मिश्र की खंडपीठ ने सुप्रीमकोर्ट के कई न्यायिक निर्णयों का दृष्टांत देते हुए यह व्यवस्था दी।
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आरोपी प्रोफेसर का कहना था कि उन पर विभाग की एक छात्रा द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने पर संस्थान के निदेशक ने जांच महिला शिकायत प्रकोष्ठ को भेज दी। महिला प्रकोष्ठ ने मनमाने तरीके से जांच की और अपनी रिपोर्ट में उनको दोषी करार दे दिया। प्रोफेसर का कहना था उनको गवाहों की प्रतिपरीक्षा का अवसर नहीं दिया गया और न ही रिपोर्ट की कॉपी दी गई। जांच कमेटी की रिपोर्ट पर निदेशक ने 26 अप्रैल 2014 को उनकी संविदा समाप्त कर दी। प्रोफेसर का कहना था कि उनके मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ, उनके खिलाफ विस्तृत अनुशासनात्मक जांच के बाद ही कार्रवाई की जा सकती है। यह भी दावा किया कि निदेशक को उन्हें निकालने का अधिकार नहीं है, क्योेंकि वह नियमित नियुक्ति पर न होकर पुन: नियुक्ति पर हैं। उनके खिलाफ विश्वविद्यालय ही नियमानुसार कार्रवाई कर सकता है। समूची कार्रवाई एक पक्षीय है।
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खंडपीठ ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि प्राकृतिक न्याय के नियम हर परिस्थिति में एक जैसे नहीं रहते विशेष कर जब छात्रा के यौन उत्पीड़न का मामला है तो संस्थान की बड़ी जिम्मेदारी होती है। याची ने जांच समिति के सामने अपना बयान दर्ज कराया था। आरोपों की उसे जानकारी थी इसलिए रिपोर्ट की कॉपी देना या गवाहों की प्रतिपरीक्षा कराना जरूरी नहीं है। विस्तृत अनुशासनात्मक जांच की भी आवश्यकता नहीं है।
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