{"_id":"579d0f994f1c1bce7d21e064","slug":"no-suresh-now-only-memories-remaining","type":"story","status":"publish","title_hn":"नहीं रहे सुरेश, अब स्मृतियां ही ‘शेष’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नहीं रहे सुरेश, अब स्मृतियां ही ‘शेष’
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 31 Jul 2016 02:29 AM IST
विज्ञापन
सुरेश कुमार शेष
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
‘जिंदगी का लमहा-लमहा उस पर भारी है तो है, क्रांतिकारी व्यक्ति कुछ हो क्रांतिकारी है तो है’, वरिष्ठ शायर एहतराम इस्लाम की यह पंक्तियां कवि-कामरेड सुरेश कुमार ‘शेष’ पर सटीक बैठती हैं। क्रांतिकारी कवि और कामरेड सुरेश कुमार शेष नहीं रहे। सांस में तकलीफ होने पर शनिवार की सुबह रोशनबाग, खुल्दाबाद स्थित आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वह 73 वर्ष के थे। वह अपने पीछे पत्नी मनोरमा सहित बेटा-बहू, पोती से भरा परिवार छोड़ गए हैं। शाम को रसूलाबाद घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। बेटे संपन्न कुमार संघर्ष ने मुखाग्नि दी। इस अवसर पर परिजन, दफ्तर के साथी और अनेक रचनाकार, रंगकर्मी आदि मौजूद थे।
वर्ष 2004 में राजस्व परिषद के संयुक्त निबंधक पद से रिटायर शेषजी ने जुझारू कर्मचारी नेता के रूप में प्रदेशव्यापी हड़ताल का नेतृत्व किया था। ट्रेड यूनियन और साहित्य के रिश्तों को जीने वाले शेष जी बंद कमरे के कवि नहीं थे। वह आम आदमी के संघर्ष को जीते थे। ‘अपना घर तक फूंक देते हैं उसूलों के गुलाम’ को सच करने वाले शेष जी ने जीवन में तमाम तरह के अभाव झेले लेकिन कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। न कभी चेहरे पर शिकन आई और न कभी दोहरा जीवन जिया।
संस्था चेतना लोक के माध्यम से उन्होंने शहर पर जब भी कभी कोई संकट आया तो सक्रिय भूमिका निभाई। अंजुमन प्रकाशन से प्रकाशित उनका कविता संग्रह ‘मौसम के हवाले से’ चर्चित रहा। ज्ञानप्रकाश के संपादन में ‘बहस’ में भी उनकी कविताएं शिद्दत से शामिल रहीं। ‘इतने पथराव हो गए, पत्थर में घाव हो गए’, ‘देश को आजाद हम भी मान लें यदि हमारे गांव का हरखू कहे’ सहित उनकी अनेक कविताएं खूब चर्चित रहीं।
विज्ञापन
कवि-कामरेड सुरेश कुमार शेष के जाने पर रचनाकारों, कर्मचारी नेताओं ने दुख व्यक्त किया है। वरिष्ठ गीतकार यश मालवीय ने स्मृतियां सहेजीं। कहा, शेषजी एजी ऑफिस के अड्डे के केंद्रीय व्यक्तित्व थे। सामाजिक और मानवीय सरोकारों को जीने वाला, उनका जाना बहुत अखरेगा। कवि राजेश कुमार ने कहा, ‘पूज्य पिता की तरह था, तेरा हाथ सुरेश/भरा न जाएगा कभी, तुझ बिन हुआ जो शेष।’ वह जीवन भर सत्त्ता से संघर्ष करते और जीतते रहे। रंगनिर्देशक अनिल रंजन भौमिक, वरिष्ठ कथाकार असरार गांधी, जयकृष्ण राय तुषार ने कहा, वह जितने अच्छे रचनाकार, उतने ही अच्छे व्यक्ति थे। व्यंग्यकार फज्ले हसनैन ने कहा, शेषजी जैसे खरे और साफगो इंसान बहुत मुश्किल से मिलते हैं।
वरिष्ठ कर्मचारी नेता कृपा शंकर श्रीवास्तव ने कहा, सुरेशजी अपने उसूलों के पक्के थे। एक बार जब वह नैनी जेल में हम लोगों से मिलने आए तो उनके झोले में कैप्सटन सिगरेट के साथ माचिस की कई डिब्बियां भी थीं। तलाशी के बाद जेलर ने कहा, माचिस की डिब्बी नहीं ले जा सकते तो शेष जी अड़ गए और वहीं घरने पर बैठ गए। उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
कायस्थ पाठशाला ट्रस्ट के अध्यक्ष चौधरी राघवेंद्र नाथ सिंह, महामंत्री एसडी कौटिल्य, हनुमान प्रसाद श्रीवास्तव, कुलदीप श्रीवास्तव आदि ने उनके निधन पर दुख व्यक्त करते हुए उन्हें जुझारू नेता बताया। अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के युवा प्रकोष्ठ के महामंत्री सुमित श्रीवास्तव, योगेंद्र कुमार, पवन श्रीवास्तव, निशीथ वर्मा, अजय श्रीवास्तव, विनोद, अखिलेश श्रीवास्तव, हरिमोहन लाल, अमित, संजय आदि ने उनके निधन को समाज के लिए बड़ी क्षति बताया। अखिल भारतीय ट्रेड़ यूनियन कांग्रेस के महामंत्री रामसागर, पद्मा सिंह, अंशु मालवीय, अनु सिंह, उत्पला, जवाहर, पुरुषोत्तम आदि ने कहा, हमने एक जुझारू नेता खो दिया।
विज्ञापन
वर्ष 2004 में राजस्व परिषद के संयुक्त निबंधक पद से रिटायर शेषजी ने जुझारू कर्मचारी नेता के रूप में प्रदेशव्यापी हड़ताल का नेतृत्व किया था। ट्रेड यूनियन और साहित्य के रिश्तों को जीने वाले शेष जी बंद कमरे के कवि नहीं थे। वह आम आदमी के संघर्ष को जीते थे। ‘अपना घर तक फूंक देते हैं उसूलों के गुलाम’ को सच करने वाले शेष जी ने जीवन में तमाम तरह के अभाव झेले लेकिन कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। न कभी चेहरे पर शिकन आई और न कभी दोहरा जीवन जिया।
विज्ञापन
संस्था चेतना लोक के माध्यम से उन्होंने शहर पर जब भी कभी कोई संकट आया तो सक्रिय भूमिका निभाई। अंजुमन प्रकाशन से प्रकाशित उनका कविता संग्रह ‘मौसम के हवाले से’ चर्चित रहा। ज्ञानप्रकाश के संपादन में ‘बहस’ में भी उनकी कविताएं शिद्दत से शामिल रहीं। ‘इतने पथराव हो गए, पत्थर में घाव हो गए’, ‘देश को आजाद हम भी मान लें यदि हमारे गांव का हरखू कहे’ सहित उनकी अनेक कविताएं खूब चर्चित रहीं।
विज्ञापन
कवि-कामरेड सुरेश कुमार शेष के जाने पर रचनाकारों, कर्मचारी नेताओं ने दुख व्यक्त किया है। वरिष्ठ गीतकार यश मालवीय ने स्मृतियां सहेजीं। कहा, शेषजी एजी ऑफिस के अड्डे के केंद्रीय व्यक्तित्व थे। सामाजिक और मानवीय सरोकारों को जीने वाला, उनका जाना बहुत अखरेगा। कवि राजेश कुमार ने कहा, ‘पूज्य पिता की तरह था, तेरा हाथ सुरेश/भरा न जाएगा कभी, तुझ बिन हुआ जो शेष।’ वह जीवन भर सत्त्ता से संघर्ष करते और जीतते रहे। रंगनिर्देशक अनिल रंजन भौमिक, वरिष्ठ कथाकार असरार गांधी, जयकृष्ण राय तुषार ने कहा, वह जितने अच्छे रचनाकार, उतने ही अच्छे व्यक्ति थे। व्यंग्यकार फज्ले हसनैन ने कहा, शेषजी जैसे खरे और साफगो इंसान बहुत मुश्किल से मिलते हैं।
वरिष्ठ कर्मचारी नेता कृपा शंकर श्रीवास्तव ने कहा, सुरेशजी अपने उसूलों के पक्के थे। एक बार जब वह नैनी जेल में हम लोगों से मिलने आए तो उनके झोले में कैप्सटन सिगरेट के साथ माचिस की कई डिब्बियां भी थीं। तलाशी के बाद जेलर ने कहा, माचिस की डिब्बी नहीं ले जा सकते तो शेष जी अड़ गए और वहीं घरने पर बैठ गए। उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
कायस्थ पाठशाला ट्रस्ट के अध्यक्ष चौधरी राघवेंद्र नाथ सिंह, महामंत्री एसडी कौटिल्य, हनुमान प्रसाद श्रीवास्तव, कुलदीप श्रीवास्तव आदि ने उनके निधन पर दुख व्यक्त करते हुए उन्हें जुझारू नेता बताया। अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के युवा प्रकोष्ठ के महामंत्री सुमित श्रीवास्तव, योगेंद्र कुमार, पवन श्रीवास्तव, निशीथ वर्मा, अजय श्रीवास्तव, विनोद, अखिलेश श्रीवास्तव, हरिमोहन लाल, अमित, संजय आदि ने उनके निधन को समाज के लिए बड़ी क्षति बताया। अखिल भारतीय ट्रेड़ यूनियन कांग्रेस के महामंत्री रामसागर, पद्मा सिंह, अंशु मालवीय, अनु सिंह, उत्पला, जवाहर, पुरुषोत्तम आदि ने कहा, हमने एक जुझारू नेता खो दिया।