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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   No right to equality on bail given by wrong information: High Court

गलत जानकारी से मिली जमानत पर समानता का अधिकार नहीं - हाईकोर्ट

Tue, 13 Jul 2021 12:15 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Tue, 13 Jul 2021 12:15 AM IST
सार

  • अभियुक्त और अभियोजन के अधिकारों के बीच संतुलन रखना आपराधिक न्याय तंत्र की जिम्मेदारी

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No right to equality on bail given by wrong information: High Court
allahabad high court - फोटो : social media

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का काम अभियुक्त और अभियोजन के अधिकारों में संतुलन बनाए रखना है। नि:संदेह अभियुक्त के अधिकार महत्वपूर्ण हैं, किंतु यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि अपराधी जेल में हों, ताकि समाज में सही संदेश जाए। कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त के प्रति सहानुभूति आपराधिक न्याय तंत्र को कमजोर बना सकती हैं। ऐसा होने से कानून के शासन के प्रति   जनविश्वास में कमी आ सकती है।
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कोर्ट ने कहा मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले सामान्य मानव नहीं रह जाते। इसलिए न्यायिक विवेक का इस्तेमाल न्यायिक तरीके से किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सह अभियुक्त को जमानत मिलने की पैरिटी (समानता) उस दशा में दूसरे अभियुक्त को नहीं दी जा सकती, जब गलत बयानी कर जमानत हासिल की गई हो। कोर्ट ने दो वाहनों से 157.570 किग्रा गांजा के साथ पकड़े गए याची को जमानत पर रिहा करने से इनकार कर दिया है।
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यह आदेश न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह ने प्रयागराज, झूंसी के गांजा तस्करी के आरोपी धीरज कुमार शुक्ल की जमानत अर्जी को खारिज करते हुए दिया है। मालूम हो कि एसटीएफ की पुलिस टीम ने दो कारों से अवैध रूप से भारी मात्रा में गांजा तस्करी के आरोप में चार लोगों को पकड़ा था और एफआईआर दर्ज कराई थी। याची का कहना था कि ऐसे ही आरोप पर सह अभियुक्त को जमानत दी गई है, उसे भी जमानत पर रिहा किया जाए।
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कोर्ट ने कहा एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 की शर्तों की कसौटी पर खरा उतरने पर ही जमानत दी जा सकती है और मादक पदार्थ की कब्जे से बरामदगी पर उपधारणा यही होगी कि तस्करी का माल है। आरोपी के कब्जे से बरामदगी नहीं हुई, साबित करने का भार आरोपी पर होता है। पुलिस द्वारा दुर्भावना से फंसाने के आरोप को भी आरोपी को साबित करना होगा कि पुलिस ने किसी रंजिश के कारण उसे फंसाया है।


अपराध का गवाह इसलिए मिलना कठिन होता है, क्योंकि अपराधियों के साथ राजनैतिक, वित्तीय संरक्षण व मसल पावर रहती है। गवाह डर के कारण सामने नहीं आते। कोर्ट ने कहा कि जमानत मिलने के बाद यह नहीं कह सकते कि वह अपराध की पुनरावृत्ति नहीं करेगा। ऐसे में जमानत मंजूर नहीं की जा सकती।
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