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Allahabad Highcourt: 19 साल पहले हुए दोहरे हत्याकांड के अभियुक्तों को राहत नहीं, दोषियों की अपील खारिज

Wed, 05 Oct 2022 09:28 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: शाहरुख खान Updated Wed, 05 Oct 2022 09:28 AM IST
सार

यह आदेश न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति सुभाष चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने रोहताश सिंह, ओमप्रकाश सिंह सहित 6 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए पारित किया है।

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No relief to the accused of double murder 19 years ago, the appeal of the culprits dismissed
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media

विस्तार

19 साल पहले अलीगढ़ के खैर थाना अंतर्गत हुई दो व्यक्तियों की हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट से दोषी पाए गए आरोपियों को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही माना और उसमें हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मामले में सही तरीके से विचार किया है, लिहाजा अपील खारिज किए जाने योग्य है।
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यह आदेश न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति सुभाष चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने रोहताश सिंह, ओमप्रकाश सिंह सहित 6 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए पारित किया है।
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मामले में याची ने सत्र न्यायालय अलीगढ़ के फैसले को चुनौती दी थी। सत्र न्यायालय ने दोषी पाए गए सभी छह आरोपियों को आजीवन कारावास और 5000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। याचियों की ओर से कहा गया कि वे निर्दोष हैं और उन्हें रंजिशन फंसाया गया है। घटना में उनका कोई योगदान नहीं रहा है, जबकि विरोधी पक्षों का कहना था कि घटना में दो व्यक्तियों की गोली मारकर हत्या की गई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और गवाहों के बयान से इसकी पुष्टि होती है। 
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कोर्ट ने पाया कि अभियोजन द्वारा लगाया गया आरोप सही है और घटना से मिले साक्ष्य, तथ्यों परिस्थितियों और गवाहों के बयान से आरोपियों पर हत्या का आरोप सिद्ध होता है। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया और याचिकाओं को खारिज करते हुए उन्हें मुकर्रर की गई सजा को सही माना। मामले में संजीव कुमार ने 4 जून 2003 को बबलू व हरवीर सिंह की हत्या करने के मामले में खैर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। ट्रायल कोर्ट ने रोहताश सिंह, ओमप्रकाश सिंह, राजेंद्र, कप्तान सिंह, टीकाराम सिंह, भूरा सिंह उर्फ नेपाल सिंह को दोषी माना और आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
 
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