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हाईकोर्ट : माता-पिता की चिंता कितनी भी सच्ची हो, बेटी के जीवनसाथी चुनने के अधिकार से ऊपर नहीं
Wed, 09 Sep 2026 04:03 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 09 Sep 2026 04:03 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि माता-पिता की चिंता कितनी भी सच्ची क्यों न हो, वह बालिग बेटी की अपनी जिंदगी और जीवनसाथी चुनने की सांविधानिक स्वतंत्रता से ऊपर नहीं हो सकती।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि माता-पिता की चिंता कितनी भी सच्ची क्यों न हो, वह बालिग बेटी की अपनी जिंदगी और जीवनसाथी चुनने की सांविधानिक स्वतंत्रता से ऊपर नहीं हो सकती। बालिग को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने और इच्छा के अनुसार जीवन जीने का अधिकार है। माता-पिता या रिश्तेदार महज अपनी असहमति के आधार पर फैसले को बदलने के लिए उसे बाध्य नहीं कर सकते।यह टिप्पणी न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए की। कोर्ट के आदेश पर बदायूं के उसावां थाने की पुलिस ने मोनी को कोर्ट में पेश किया।
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कोर्ट ने उससे उसकी उम्र, विवाह और परिस्थितियों के बारे में बातचीत की। मोनी ने बताया कि उसकी जन्मतिथि आठ जून 2008 है और वह बालिग हो चुकी है। कहा कि उसने 18 जुलाई 2026 को मोहित से मर्जी से शादी की थी। वह उसके साथ पत्नी के रूप में रहना चाहती है।कोर्ट ने मोहित से भी बातचीत की। उसने शादी की बात स्वीकार करते हुए मोनी के साथ रहने की इच्छा जताई। वहीं, मोनी के पिता संजीव ने भी कोर्ट में स्वीकार किया कि उनकी बेटी बालिग है।
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हालांकि, वह उसके विवाह और फैसले से नाराज थे। इस पर कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और जीवनसाथी चुनने का अधिकार अनुच्छेद-21 का अभिन्न हिस्सा है। बालिग की पसंद को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि परिवार को उसका फैसला पसंद नहीं है। कोर्ट ने मोनी को मोहित के साथ रहने की स्वतंत्रता दी। साथ ही पुलिस को दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसी भी तरह की धमकी, दबाव या उत्पीड़न से बचाने का आदेश दिया है।
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