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नौ हजार रुपये मुआवजे का विवाद 54 वर्षों से लंबित
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Thu, 21 Jul 2016 01:07 AM IST
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मुकदमा
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हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से पूछा है कि उसने अब तक कोई मुकदमा नीति क्यों नहीं तैयार की है। सूबे की अदालतों और हाईकोर्ट में छोटे-छोटे मामलों के दशकों से मुकदमे लंबित हैं। इससे अदालतों पर बेवजह का बोझ पड़ता है। कोर्ट ने मुख्य सचिव से इस बाबत हलफनामा मांगा है कि उसने अब तक कोई मुकदमा नीति तैयार की है अथवा नहीं। यदि नीति नहीं बनाई गई है तो उसे अब तक बना ली जाएगी।
अदालत का मानना है कि राज्य सरकार स्वयं वादकारी के रूप में छोटे-छोटे किसानों को मिलने वाले मुआवजे के खिलाफ अपील दाखिल करती है। क्या उसे ऐसा करना चाहिए। सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे भूमि अधिग्रहण के मामले में छोटे मुआवजे की धनराशि के विरुद्ध अपीलें दाखिल न की जाएं। इस प्रकार का कोर्ट के ध्यान आगरा विकास प्राधिकरण की ओर से दाखिल प्रथम अपील की सुनवाई करते हुए गया। प्राधिकरण ने 9587 रुपये मुआवजे के भुगतान के खिलाफ 54 साल पहले अपील दाखिल की थी। मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति एसपी केसरवानी ने कहा कि यह गरीब किसान को एक प्रकार से परेशान करना है।
मामले के अनुसार 28 दिसंबर 1959 में फतेहपुर सीकरी में रिहायशी कालोनी बनाने के लिए आगरा के भोगीपुर गांव की जमीन अधिग्रहीत की गई। तत्कालीन भू आध्याप्ति अधिकारी ने तीन रुपये प्रतिवर्ग गज मुआवजा तय करते हुए अवार्ड घोषित किया। आगरा विकास प्राधिकरण ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर दी। अपील का कुल मूल्यांकन 9587 रुपये है। यह मुकदमा 54 वर्षों से हाईकोर्ट में लंबित है।
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केंद्र सरकार ने 2009 में मुकदमा नीति बनाई है। इसके तहत 15 वर्षों से लंबित मुकदमों को अधिकतम तीन वर्ष में तय कर देना है। व्यर्थ और अनावश्यक मुकदमेबाजी को समाप्त करना तथा कम मूल्य वाले मुआवजे के खिलाफ अपील दाखिल नहीं करना शामिल है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स विभाग में भी व्यवस्था है कि 10 लाख रुपये तक के मुकदमे में अपील दाखिल नहीं की जाएगी। सिर्फ कानूनी पेच फंसने पर ही अपील होगी।
हाईकोर्ट में पांच हजार रुपये से लेकर 40 हजार रुपये मूल्य के भूमि अधिग्रहण अवार्ड के खिलाफ अपीलें दाखिल होती हैं। इससे अदालत का समय बर्बाद होता है। यदि सरकार अपील दाखिल करने के बजाए भुगतान कर दे तो अदालत को कीमती समय दूसरे जरूरी मुकदमों के निस्तारण में लग सकता है। कई राज्यों गुजरात, उड़ीसा, असम, झारखंड, हिमांचल प्रदेश और बिहार आदि अपनी मुकदमा नीति बना चुके हैं। इस मामले पर अगली सुनवाई 29 जुलाई को होगी।
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अदालत का मानना है कि राज्य सरकार स्वयं वादकारी के रूप में छोटे-छोटे किसानों को मिलने वाले मुआवजे के खिलाफ अपील दाखिल करती है। क्या उसे ऐसा करना चाहिए। सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे भूमि अधिग्रहण के मामले में छोटे मुआवजे की धनराशि के विरुद्ध अपीलें दाखिल न की जाएं। इस प्रकार का कोर्ट के ध्यान आगरा विकास प्राधिकरण की ओर से दाखिल प्रथम अपील की सुनवाई करते हुए गया। प्राधिकरण ने 9587 रुपये मुआवजे के भुगतान के खिलाफ 54 साल पहले अपील दाखिल की थी। मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति एसपी केसरवानी ने कहा कि यह गरीब किसान को एक प्रकार से परेशान करना है।
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मामले के अनुसार 28 दिसंबर 1959 में फतेहपुर सीकरी में रिहायशी कालोनी बनाने के लिए आगरा के भोगीपुर गांव की जमीन अधिग्रहीत की गई। तत्कालीन भू आध्याप्ति अधिकारी ने तीन रुपये प्रतिवर्ग गज मुआवजा तय करते हुए अवार्ड घोषित किया। आगरा विकास प्राधिकरण ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर दी। अपील का कुल मूल्यांकन 9587 रुपये है। यह मुकदमा 54 वर्षों से हाईकोर्ट में लंबित है।
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केंद्र सरकार ने 2009 में मुकदमा नीति बनाई है। इसके तहत 15 वर्षों से लंबित मुकदमों को अधिकतम तीन वर्ष में तय कर देना है। व्यर्थ और अनावश्यक मुकदमेबाजी को समाप्त करना तथा कम मूल्य वाले मुआवजे के खिलाफ अपील दाखिल नहीं करना शामिल है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स विभाग में भी व्यवस्था है कि 10 लाख रुपये तक के मुकदमे में अपील दाखिल नहीं की जाएगी। सिर्फ कानूनी पेच फंसने पर ही अपील होगी।
हाईकोर्ट में पांच हजार रुपये से लेकर 40 हजार रुपये मूल्य के भूमि अधिग्रहण अवार्ड के खिलाफ अपीलें दाखिल होती हैं। इससे अदालत का समय बर्बाद होता है। यदि सरकार अपील दाखिल करने के बजाए भुगतान कर दे तो अदालत को कीमती समय दूसरे जरूरी मुकदमों के निस्तारण में लग सकता है। कई राज्यों गुजरात, उड़ीसा, असम, झारखंड, हिमांचल प्रदेश और बिहार आदि अपनी मुकदमा नीति बना चुके हैं। इस मामले पर अगली सुनवाई 29 जुलाई को होगी।