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मोरारी बापू ने हनुमान जी की पूजा की

Wed, 04 Mar 2020 12:45 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Wed, 04 Mar 2020 12:45 AM IST
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morari bapu worshiped lord hnuman
morari bapu worshiped lord hnuman - फोटो : CITY DESK
मोरारी बापू ने लेटे हनुमान की उतारी आरती, बाघंबरी मठ पहुंचे
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संत मोरारी बापू ने मंगलवार की शाम लेटे हनुमान का दर्शन किया। इस दौरान उन्होंने सविधि आरती उतारी। संतों और वैदिक आचार्यों ने बापू को दर्शन-पूजन कराया। मोरारी बापू बाघंबरी गद्दी मठ भी पहुंचे। वहां उन्होंने अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि से मुलाकात की। इस दौरान अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ने बाघंबरी गद्दी के नामकरण के बारे में भी बापू को जानकारी दी।
मोरारी बापू ने व्यास पीठ से मानस प्रेमियों, खासकर युवाओं से अपील की कि आप मुझे वर्ष भर में एक बार सिर्फ नौ दिन दीजिए। मैं आपको नवजीवन दूंगा। उन्होंने भगवान राम के चरणों की महिमा का भी तुलसी की चौपाइयों केजरिए बखान किया। बताया कि राम और सीता के चरणों में 48 प्रकार के चिह्न मौजूद हैं। इसमें तीसरा चिह्न छत्र है। छत्र राजा के सिर पर शोभता है, लेकिन वो रहता भगवान के चरण में ही है। परमात्मा का छत्र उनके चरण में है। क्योंकि परमात्मा शोभा का गुलाम नहीं होता। उन्होंने प्रभु श्रीराम के बाएं पैर में 24 और सीता के दाएं पैर में 24 चिह्नों के बारे में जानकारी दी। बापू ने कहा कि जो इंसान है, वह गलतियां करेगा। इसमें इतना हंगामा नहीं होना चाहिए। गलतियां नहीं करेगा तो वह फरिश्ता हो जाएगा।
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मोरारी बापू ने मंगलवार को सती मोह की वह कथा सुनाई, जिसे कभी याज्ञवल्क्य ऋषि ने भरद्वाजमुनि को अक्षयवट के नीचे बैठकर सुनाई थी। इस कथा कगे जरिए उन्होंने गुरु के प्रति भावों को अभिव्यक्त किया। बताया कि ज्ञान देने वाला, मार्ग दर्शन करने वाला गुरु होता है। गुरु ही निष्ठा है। शिव से बिछुड़ने के बाद महर्षि नारद ने पार्वती को तपस्या करने का उपाय बताया था। जब सती ने तपस्या शुरू की तब सप्तर्षियों ने उनकी परीक्षा ली थी। सप्तर्षियों ने उनसे तप का मार्ग छोड़ने का आग्रह किया था। तब सती ने इंकार कर दिया था। सती ने कहा था कि गुरु के वचन पर जिसे भरोसा नहीं होता उसे जीवन में कभी सुख नहीं मिल सकता। दक्ष कन्या के रूप में शिव के त्याग के बाद सती बनकर शिव को पाने के लिए हिमालय पुत्री के रूप में उन्होंने तप किया था।
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मोरारी बापू ने जीवन में राम और कृष्ण नाम के प्रभावों की भी चर्चा की। बताया कि रामनाम जीवनदायी है। जबकि कृष्ण नाम जीवन का रस देने वाला है। राम मर्यादा देते हैं। जीवन को एक मार्ग पर चलाने की प्रेरणा राम के आदर्शों से मिलती है, तो कृष्ण उस जीवन में रस भरते हैं।
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