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मराठे और प्रयागराज : समर्थगुरु रामदास ने की थी संकटमोचन की प्रतिमा स्थापना

Wed, 16 Jun 2021 08:17 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 16 Jun 2021 08:17 PM IST
सार

माघ मेले में संतों ने किया था ‘समर्थ’ का नामकरण, बाद में काशी में अभिषेक
 

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Marathe and Prayagraj: Samarthguru Ramdas had established the statue of Sankatmochan
हनुमान मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रयागराज (अनिल सिद्धार्थ)। मराठों के आगमन और आक्रमण से पहले प्रयागराज की धरती पर छत्रपति शिवाजी के गुरु संत समर्थगुरु रामदास के पांव पड़े थे। बालपन में मां उन्हें नारायण सूर्याजीपंत कुलकर्णी कहकर बुलाती थीं। आरंभ से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति के नारायण, राम के अनन्य भक्त थे सो अपने को राम का दास बताने के कारण उनका नाम रामदास पड़ गया। मात्र चौबीस वर्ष की आयु में भारत भ्रमण पर निकले रामदास ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक तकरीबन 1100 मठों, अखाड़ों की स्थापना की।

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Marathe and Prayagraj: Samarthguru Ramdas had established the statue of Sankatmochan
prayagraj news : समर्थ गुरु रामदास। - फोटो : prayagraj

भारत भ्रमण के दौरान हनुमत उपासक रामदास ने नवचेतना के निर्माण के उद्देश्य से जगह-जगह हनुमानजी की मूर्ति स्थापित करने के साथ ही मठ एवं मठाधीश बनाए। इसी क्रम में वह प्रयागराज भी आए और यहां दारागंज के पूर्वी छोर पर गंगा किनारे उन्होंने संकटमोचन हनुमान की दक्षिणमुखी प्रतिमा की स्थापना की। वर्तंमान में रेलवे पुल के उत्तर स्थापित संकटमोचन का यह मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी का कहना है कि सन 1632 से 1640 ईसवी के बीच प्रयागराज आए समर्थगुरु रामदास ने प्रवास के दौरान मूर्ति स्थापना के साथ ही माघ मेले में रहकर संगम की रेती पर साधना भी की। कहते हैं, संगम की रेती पर ही उनकी अतुलनीय बौद्धिक क्षमता के कारण संतों ने रामदास का नामकरण समर्थ गुरु रामदास कर दिया। लेकिन, यहां से काशी पहुंचने पर काशी की विद्वत परिषद ने अभिषेक करके उनके नामकरण की पुष्टि की।

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हनुमानजी

निरंजनी अखाड़े में है समर्थगुरु रामदास स्थापित हनुमत प्रतिमा

वैसे मराठी समाज के तीर्थपुरोहित और दारागंज स्थित उत्तराधिमठ के प्रमुख पुजारी राघवेंद्र आचार्य का दावा है कि समर्थ गुरु रामदास ने जिस संकटमोचन प्रतिमा की स्थापना की थी, वह रेलवे पुल के उत्तर पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी की गंगा की ओर उतरने वाली सीढ़ियों के करीब कोने पर बने मंदिर में स्थित है। अपने दावे को पुष्ट करते हुए उन्होंने जोड़ा, हनुमान जी की यह अकेली ऐसी प्रतिमा है जिसके दाएं हाथ में गदा और बाएं हाथ में मराठों का प्रतीक ध्वज है। कहा जाता है कि गुरु रामदास ने जहां-जहां प्रतिमाएं स्थापित कीं, वहां उन्होंने अपनी निशानी भी छोड़ी। सूर्योपासक रामदास की ओर से स्थापित हनुमान जी की इस प्रतिमा के पीछे बना सूर्यचक्र इसका प्रमाण है।
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