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मराठे और प्रयागराज : अहिल्याबाई होल्कर की देन है दारागंज का कच्चा वाड़ा, पक्का वाड़ा

Wed, 16 Jun 2021 09:19 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 16 Jun 2021 09:19 PM IST
सार

  • मोरी मार्ग पर पहले बना कच्चा वाड़ा, फिर पक्का वाड़ा, यशवंत और बसंत

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Marathe and Prayagraj: Ahilyabai Holkar's gift is Kachcha Wada, Pakka Wada of Daraganj
prayagraj news : अहिल्या बाई होल्कर। - फोटो : prayagraj

विस्तार

प्रयागराज (अनिल सिद्धार्थ)। दारागंज में भारतीय स्टेट बैंक के ठीक सामने से लेकर, दक्षिणी ओर से मोरी मार्ग की ओर आगे बढ़ने पर नई इमारतों के बीच कई पुरानी जर्जर इमारतें आपको बरबस रोककर कुछ कहना चाहती हैं। दरअसल ये इमारतें प्रयागराज और मराठा शासकों के रिश्तों की जीती जागती कहानी हैं, जिन पर वक्त की धूल भले ही पड़ गई हो लेकिन भीतर भोंसले और होल्कर शासकों का इतिहास अब भी धड़कता है।

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मोरी पर एक छोटे से दरवाजे से भीतर दाखिल होने पर गलियारा पार करते ही एक बड़ा आंगन और चारों ओर बरामदे, कोठरियां और मंदिर देखकर आप चकित हो जाएंगे। यहां एक भरा-पूरा मराठा समाज अब भी संस्कृति को सांसें दे रहा है। आंगन, बरामदे में बिछे पत्थर और कोठरियों के बावजूद इसे कच्चा वाड़ा के नाम से जाना जाता है। उत्तर की ओर एक गली छोड़कर पक्का वाड़ा और स्टेट बैंक के दक्षिणी ओर यशवंत और बसंत वाड़ा भी है।

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Marathe and Prayagraj: Ahilyabai Holkar's gift is Kachcha Wada, Pakka Wada of Daraganj
prayagraj news : कच्चा वाड़ा। - फोटो : prayagraj
ये वाड़े प्रयागराज को समृद्ध करने में इंदौर की राजमाता अहिल्याबाई होल्कर के योगदान का सुबूत हैं। 18 वीं शताब्दी के दौरान उनके योगदान से ही मालवा क्षेत्र स्वर्ण युग में दाखिल हुआ। 1767 में मालवा की रानी के रूप में सत्ता संभालने के बाद उन्होंने मालवा का राज्य अपने आराध्य देव भगवान शिव को समर्पित करते हुए घोषणा की थी कि वह भगवान शिव को संरक्षक मानकर सत्ता संभालेंगी और जनकल्याणकारी कार्य करेंगी। यहां तक कि उनके सभी शासकीय आदेशों में शासक के हस्ताक्षर की जगह ‘श्री शंकर’ ही लिखा जाता था।

मंदिरों के संरक्षण, पुनर्निर्माण, नवीनीकरण के अतिरिक्त उन्होंने न सिर्फ सराय, आश्रय, धर्मशालाएं बनवाईं बल्कि तीर्थयात्रियों के नि:शुल्क भोजन के लिए वहां रसोइयां भी बनवाई। तकरीबन 70 वर्ष की आयु में वर्ष 1795 में वह नहीं रहीं लेकिन देश भर में उनकी निशानियां आज भी हैं। प्रयागराज की सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानने वाले बाबा अभय अवस्थी कहते हैं, अहिल्याबाई की ऐसी ही निशानी दारागंज मोहल्ले में तीर्थयात्रियों के लिए बनवाए गए ये वाड़े हैं।

कच्चा वाड़ा में ही रहने वाले महाराष्ट्र लोकसेवा मडंल से जुड़े मनोज केलकर ने जोड़ा, धार्मिक प्रवृत्ति की महारानी ने प्रयाग आने वाले तीर्थयात्रियों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था के लिए ही इन वाड़ों का निर्माण करवाया था। कच्चा वाड़ा पहले बना और फिर पक्का, फिर यशवंत और बसंत वाड़ा। कच्चा वाड़ा में ही पश्चिमी बरामदे में बने मंदिरों में अहिल्याबाई और दत्तात्रेय जी की मूर्तियां स्थापित हैं। महारानी अहिल्या के उत्तराधिकारी तुकोजी राव महाराज ने उन्हीं की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सन 1912 में कच्चा वाड़ा में ही मार्तंडेश्वर महादेव का मंदिर बनवाया।

ऐसे हुआ वाड़ों का नामकरण
वाड़ों के नामकरण को लेकर अलग-अलग राय है। एक वर्ग का मानना है कि कच्चे मकानों की निर्माण शैली में बनने के कारण ही कच्चा वाड़ा कहा गया जबकि पक्का वाड़ा में पक्की छत के ऊपर भी एक मंजिल है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि खाने के आधार पर इन वाड़ों का नामकरण किया गया। जिन्हें कच्चा खाना खाना होता था, वह कच्चे वाड़ेे में ठहरते थे जबकि पक्का खाना के इच्छुक तीर्थयात्री पक्का वाड़ा में रुकते थे।
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Marathe and Prayagraj: Ahilyabai Holkar's gift is Kachcha Wada, Pakka Wada of Daraganj
prayagraj news : पक्का वाड़ा। - फोटो : prayagraj
भोंसले सरकार ने गुरु की समाधि की देखभाल को बनवाया था वाड़ा
होल्कर स्टेर की ओर से भी स्टेट बैंक और गंगा भवन के ठीक सामने वाड़ा वनवाया गया, जिसें जोशी परिवार रहता है। इसी के आहाते में सैकड़ों वर्षों पुराना शमी का वृक्ष है। पुरोहित दिनकर जोशी और बलराम जोशी बताते हैं कि नागपुर के भोंसले शासक की ओर से ही इलाहाबाद विजय के कई दशकों बाद यह वाड़ा बनवाया गया, जिसे भोंसले सरकार का वाड़ा कहते हैं। इसी वाड़े की पहली मंजिल पर शमी के पेड़ से थोड़ी ही दूरी पर मराठा गुरु केजा जी महाराज की जीवित समाधि है, जिसकी पूजा-अर्चना और देखभाल के लिए ही इस वाड़े का निर्माण कराके पुरोहितों को बसाया गया था।
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