Prayagraj : भाषा से जुड़े विरोधाभास सुलझाएंगी पांडुलिपियां, अष्टाध्यायी के पांडुलिपियों पर चल रहा है कार्य
भारत और विदेशों के पुस्तकालयों, मंदिर, अभिलेखागारों और निजी संग्रहों में हजारों हस्तलिखित पांडुलिपियां हैं, जो पीली पड़ चुकी हैं और सदियों से लगभग अनछुई हैं। इन्हीं में मानव इतिहास की सबसे असाधारण बौद्धिक उपलब्धियों में से एक पाणिनि की अष्टाध्यायी का रहस्य छिपा है।
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भारत और विदेशों के पुस्तकालयों, मंदिर, अभिलेखागारों और निजी संग्रहों में हजारों हस्तलिखित पांडुलिपियां हैं, जो पीली पड़ चुकी हैं और सदियों से लगभग अनछुई हैं। इन्हीं में मानव इतिहास की सबसे असाधारण बौद्धिक उपलब्धियों में से एक पाणिनि की अष्टाध्यायी का रहस्य छिपा है। करीब ढाई हजार साल पुराने इस ग्रंथ की भाषा से जुड़े विरोधाभास को सुलझाने के लिए केरल में स्थित अमृता विश्व विद्यापीठम के को-प्रिंसिपल इंवेस्टिगेटर डॉ. प्रशांत बानुदेवन और उनकी टीम इस ग्रंथ के क्रिटिकल एडिशन को तैयार करने का शोध कार्य कर रही है। इस परियोजना की शुरुआत भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) की पहल से हुई और इस परियोजना को इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (आईसीएसएसआर) से अनुदान प्राप्त हुआ है।
अबतक मिलीं 700 पांडुलिपियां, अन्य की खोज जारी
डॉ. प्रशांत बानुदेवन बताते हैं कि इस परियोजना का वास्तविक आधार पांडुलिपियों का विशाल संग्रह है। अब तक उनकी टीम भारत के लगभग सभी हिस्सों और विदेशों से अष्टाध्यायी की लगभग 700 पांडुलिपियां जुटा चुकी है। डॉ. बानुदेवन कहते हैं कि हर पांडुलिपि गवाह है कि अलग-अलग समय और स्थानों पर इस ग्रंथ के संस्कृत व्याकरण की भाषा को कैसे समझा गया, कैसे नकल किया गया और संस्कृत व्याकरण के सूत्रों में कब और क्या बदलाव आया। उनका कहना है कि पांडुलिपि जितनी अधिक होगी, पाणिनि के मूल पाठ तक पहुंच उतनी ही सटीक होगी।
यह है क्रिटिकल एडिशन और इसलिए है जरूरी
क्रिटिकल एडिशन किसी ग्रंथ का सामान्य पुनर्प्रकाशन नहीं, बल्कि सैकड़ों हजारों पांडुलिपियों को आमने-सामने रखकर उनके अंतर को समझे जाते हैं, विरोधाभास सुलझाए जाते हैं और अंत में उस पाठ को तैयार किया जाता है जो मूल के सबसे करीब हो। डॉ. प्रशांत बानुदेवन बताते हैं कि अष्ठाध्यायी के मामले में चुनौती बहुत बड़ी है क्योंकि यह ग्रंथ दो हजार साल से अधिक समय तक हस्तलिखित रूप में चला आ रहा है। कहीं लिपिकीय त्रुटियां हैं तो कहीं क्षेत्रीय परंपराओं का असर होता है। इसी के साथ टीम पारंपरिक भाष्यों का भी गहन अध्ययन कर रही है, जिससे सदियों से चली आ रही परंपरा को भी समझा जा सके। टीम का लक्ष्य 2027 तक पहले अध्याय का क्रिटिकल एडिशन तैयार करना है।
हाल ही में डॉ. प्रशांत बानुदेवन पांडुलिपियों की तलाश में प्रयागराज आए थे। उन्होंने बताया कि वो दो-तीन साल पहले भी प्रयागराज आए थे और केन्द्रीय संस्कृत विश्व विद्यालय से शोध कार्य के लिए पांडुलिपियां संग्रहीत की थी। इस बार उन्होंने हिंदुस्तानी एकेडमी और इलाहाबाद संग्रहालन में मौजूद पांडुलिपियों को अपने शोध में शामिल किया है।
संस्थागत बाधाएं बनी चुनौती, निजी संग्रहकों और परिवारों का रहा योगदान
डॉ. प्रशांत बानुदेवन बताते हैं कि शोध कार्य की रफ्तार जितनी तेज है, रुकावटें भी उतनी ही हैं। देशभर के कई संस्थानों और पुस्तकालयों में पांडुलिपियां मौजूद हैं, लेकिन उन्हें साझा करने से मना कर दिया जाता है। डिजिटल प्रतियां होने के बावजूद उन्हें साझा नहीं किया जाता है। अष्टाध्यायी देश के विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है। फिर भी इसकी पांडुलिपियां मानों तिजोरियों में बंद है। वहीं दूसरी ओर निजी संग्रहकों और परिवारों ने इस काम में अधिक सहयोग दिखाया है। पीढियों से घरों में सुरक्षित पांडुलिपियां, निजी पुस्तकालयों और ट्रस्टों में रखी धरोहर स्वेच्छा से परियोजना का हिस्सा बनी है। टीम ने सार्वजनिक अपील की है कि यदि किसी के पास अष्टाध्यायी की पांडुलिपि है तो वह उसकी प्रतियां या जानकारी ammasprasanth@gmail.com पर साझा कर सकते हैं।