{"_id":"571939a44f1c1b4b048b4bd3","slug":"man-made-crisis-for-the-survival-of-earth-itself","type":"story","status":"publish","title_hn":"धरा के साथ खुद के अस्तित्व के लिए संकट बना मनुष्य","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
धरा के साथ खुद के अस्तित्व के लिए संकट बना मनुष्य
सुरभि गुप्ता, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 22 Apr 2016 02:07 AM IST
विज्ञापन
प्रलय के समय की अवधारणा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पेड़ों की अधाधुंध कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का जरूरत से ज्यादा दोहन करके मनुष्य धरा के साथ खुद के अस्तित्व के लिए भी संकट पैदा कर रहा है। हवा में कार्बन और अन्य खतरनाक तत्वों की मात्रा में एक दशक के दौरान 12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। हवा ही नहीं, जल और मिट्टी भी जहर घुल रहा है। भीषण सूखा, बाढ़ और मौसम में अचानक हुए बदलाव को इसी का नतीजा माना जा रहा है। भूजल और धरती के नीचे दबे अन्य प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन से भूकंप की घटनाओं में भी इजाफा हुआा है। वैज्ञानिकों की स्पष्ट चेतावनी है कि प्राकृतिक संसाधनों से खिलवाड़ बंद नहीं हुआ तो पूरी सृष्टि खतरे में पड़ जाएगी।
वैज्ञानिकों के मुताबिक पिछले 30 वर्षों में पृथ्वी का तापमान 0.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। वहीं, 20 वर्षों में कार्बन डाई आक्साइड की आर्द्रता 340 पार्टपर मिलियन से बढ़कर 380 पर पहुंच गई है। इसी तरह नाइट्रस ऑक्साइड भी 295 से बढ़कर 315 पार्टपर मिलियन पर आ गई है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अर्थ एंड प्लैनेटरी साइंसेस के प्रो. जयंत नाथ त्रिपाठी ने बताया कि पर्यावरण में बदलाव होते रहते हैं, लेकिन पिछले 30-40 वर्षों से जिस रफ्तार से बदलाव हुआ है, वह चिंताजनक है। कार्बन डाई ऑक्साइड की सार्द्रता सबसे अधिक है। इसके पीछे गाड़ियों का धुआं सबसे बड़ा कारण है। कार्बन डाई आक्साइड के बढ़ने की वजह से तापमान बढ़ रहा है। वर्षां होने पर कार्बन डाई आक्साइड पानी में घुल जाता है। इससे कार्बोनिक एसिड बनता है, जो मिट्टी की उवर्रता और नदियों में पहुंचने पर पानी की क्षारीयता प्रभावित करता है। जंगलों को काटकर कंक्रीट के महल बनाने से वर्षा जल का संचय काफी कम हो गया है। जितनी संख्या में पेड़ काटे गए, उस अनुपात में लगाए नहीं गए।
इविवि के वायु मंडलीय एवं समुद्र विज्ञान केंद्र के प्रमुख डॉ. सुनीत द्विवेदी का कहना है कि जिस तरह से कार्बन डाई आक्साइड समेत दूसरे खतरनाक तत्व वातावरण में बढ़े हैं, उससे धरती और जल के लिए दुष्परिणाम भी बढ़ गए हैं। पेड़ों की लगातार हो रही कटाई और प्राकृतिक स्नोतों दोहन के कारण भूंकप और सूखा पड़ रहा है। प्रकृति के साथ इस छेड़छाड़ को रोकना होगा। विकास जरूरी है, लेकिन ऊर्जा के वैकल्पिक संसाधन भी तलाशने होंगे। जिससे आगे आने वाली पीढ़ी को भी हम बेहतर भविष्य दे सकें। इविवि के सेंटर ऑफ इनवायरमेंटल स्टडीज के डॉ. बीके द्विवेदी का कहना है कि बुंदेलखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी और जल संकट के लिए मनुष्य ही कहीं न कहीं जिम्मेदार है। जल स्नोतों का दोहन किया जा रहा है। अगर अभी नहीं चेते तो आने वाले समय में हालात और बदतर होंगे। सेंटर के ही डॉ. पवन झा कहते हैं कि भौतिकता की दौड़ में हमने पृथ्वी के बारे में सोचना ही छोड़ दिया। खेती की जमीन कम होती जा रही है जबकि संतुलन के लिए यह काफी कारगर है। इससे भूजल स्तर भी प्रभावित हो रहा है।
विज्ञापन
इनसे सुधर सकते हैं हालात
0 अधिक से अधिक पौधे लगाएं
0 पौधों की देखभल भी करें
0 इको फ्रेंडली संसाधनों का प्रयोग करें
0 प्राकृतिक संसाधनों का दोहन न करें
0 पानी की बर्बादी न करें, वर्षा जल का संचयन बेहद जरूरी
विज्ञापन
वैज्ञानिकों के मुताबिक पिछले 30 वर्षों में पृथ्वी का तापमान 0.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। वहीं, 20 वर्षों में कार्बन डाई आक्साइड की आर्द्रता 340 पार्टपर मिलियन से बढ़कर 380 पर पहुंच गई है। इसी तरह नाइट्रस ऑक्साइड भी 295 से बढ़कर 315 पार्टपर मिलियन पर आ गई है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अर्थ एंड प्लैनेटरी साइंसेस के प्रो. जयंत नाथ त्रिपाठी ने बताया कि पर्यावरण में बदलाव होते रहते हैं, लेकिन पिछले 30-40 वर्षों से जिस रफ्तार से बदलाव हुआ है, वह चिंताजनक है। कार्बन डाई ऑक्साइड की सार्द्रता सबसे अधिक है। इसके पीछे गाड़ियों का धुआं सबसे बड़ा कारण है। कार्बन डाई आक्साइड के बढ़ने की वजह से तापमान बढ़ रहा है। वर्षां होने पर कार्बन डाई आक्साइड पानी में घुल जाता है। इससे कार्बोनिक एसिड बनता है, जो मिट्टी की उवर्रता और नदियों में पहुंचने पर पानी की क्षारीयता प्रभावित करता है। जंगलों को काटकर कंक्रीट के महल बनाने से वर्षा जल का संचय काफी कम हो गया है। जितनी संख्या में पेड़ काटे गए, उस अनुपात में लगाए नहीं गए।
विज्ञापन
इविवि के वायु मंडलीय एवं समुद्र विज्ञान केंद्र के प्रमुख डॉ. सुनीत द्विवेदी का कहना है कि जिस तरह से कार्बन डाई आक्साइड समेत दूसरे खतरनाक तत्व वातावरण में बढ़े हैं, उससे धरती और जल के लिए दुष्परिणाम भी बढ़ गए हैं। पेड़ों की लगातार हो रही कटाई और प्राकृतिक स्नोतों दोहन के कारण भूंकप और सूखा पड़ रहा है। प्रकृति के साथ इस छेड़छाड़ को रोकना होगा। विकास जरूरी है, लेकिन ऊर्जा के वैकल्पिक संसाधन भी तलाशने होंगे। जिससे आगे आने वाली पीढ़ी को भी हम बेहतर भविष्य दे सकें। इविवि के सेंटर ऑफ इनवायरमेंटल स्टडीज के डॉ. बीके द्विवेदी का कहना है कि बुंदेलखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी और जल संकट के लिए मनुष्य ही कहीं न कहीं जिम्मेदार है। जल स्नोतों का दोहन किया जा रहा है। अगर अभी नहीं चेते तो आने वाले समय में हालात और बदतर होंगे। सेंटर के ही डॉ. पवन झा कहते हैं कि भौतिकता की दौड़ में हमने पृथ्वी के बारे में सोचना ही छोड़ दिया। खेती की जमीन कम होती जा रही है जबकि संतुलन के लिए यह काफी कारगर है। इससे भूजल स्तर भी प्रभावित हो रहा है।
विज्ञापन
इनसे सुधर सकते हैं हालात
0 अधिक से अधिक पौधे लगाएं
0 पौधों की देखभल भी करें
0 इको फ्रेंडली संसाधनों का प्रयोग करें
0 प्राकृतिक संसाधनों का दोहन न करें
0 पानी की बर्बादी न करें, वर्षा जल का संचयन बेहद जरूरी