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सिविल सेवा में प्री ही नहीं मेंस भी है बड़ी बाधा

Sun, 07 Aug 2016 02:17 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sun, 07 Aug 2016 02:17 AM IST
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Man is not the only major obstacle to civil service Prix
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 संघ लोक सेवा आयोग की ओर से सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2016 रविवार को होगी। इस बार भी अकेले इलाहाबाद में 39 हजार से अधिक अभ्यर्थी पंजीकृत हैं, लेकिन विगत कुछ वर्षों से निराशाजनक परिणाम ने हिन्दी पट्टी के प्रतियोगियों का उत्साह फीका कर दिया है। प्रारंभिक परीक्षा में सीसैट ही नहीं मुख्य परीक्षा में हुए बदलावों ने भी सफलता पर ब्रेक लगा दिया है। यहां के प्रतियोगी इस बदलाव के अनुरूप खुद को नहीं ढाल पा रहे। इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय और कालेजों में पढ़ाई के गिरते स्तर ने रही-सही उम्मीद भी तोड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि सिविल सेवा की तैयारी के लिए विश्वविद्यालय और हॉस्टल केंद्र हुआ करते थे, लेकिन अब माहौल पूरी तरह से विपरीत हो चुका है।
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2007 में इलाहाबाद के 76 अभ्यर्थी सिविल सेवा भर्ती परीक्षा में सफल हुए थे। इसके अगले साल यह संख्या 46 रही, लेकिन इसके बाद संख्या इकाई में पहुंच गई। 2015 में प्रारंभिक परीक्षा में सीसैट को क्वालीफाइंग पेपर किए जाने के बाद सिविल सेवा में हिन्दी पट्टी के प्रतियोगियों की एक बार फिर वर्चस्व की उम्मीद की गई थी, लेकिन मुख्य परीक्षा का परिणाम घोषित होने के साथ ही निराशा हाथ आई। नतीजतन, अंतिम रूप से पांच अभ्यर्थी भी सफल नहीं हुए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के रिटायर अध्यापक प्रोफेसर बीएन मिश्रा का कहना है कि परीक्षा प्रारूप में बदलाव इसका मुख्य कारण है। यहां के प्रतियोगी इसके अनुरूप खुद को तैयार नहीं कर पाए हैं। इसकी वजह से इनका सही मूल्यांकन नहीं हो पा रहा। हिन्दी में स्तरीय पाठ्य सामग्री का अभाव भी बड़ी वजह है। इसके अलावा विश्वविद्यालय और कालेजों में पढ़ाई का स्तर गिरा है।
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विश्वविद्यालय की सिविल सेवक देने वाले संस्थान के रूप में पहचान रही है। इन सभी पहलुओं पर सामूहिक चिंतन और प्रयास की जरूरत है। सिविल सेवा कोच रनीश जैन का कहना है कि मुख्य परीक्षा में सामान्य अध्ययन के चार पेपर हो गए हैं। इसमें अब अभ्यर्थी की मौलिक सोच और अभिव्यक्ति क्षमता का आकलन किया जाता है। एथिक्स के पेपर की तैयारी के लिए अभ्यर्थी को अलग-अलग घटनाओं को सामने रखकर खुद एनालिसिस करना होगा। इसे पढ़ाया नहीं जा सकता। दक्षिण भारत तथा अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में बचपन से ही विद्यार्थियों की मौलिक सोच और लेखन क्षमता को विकसित किया जाता है। इसका उन्हें फायदा मिल रहा है। यहां भी इस बारे में सोचना होगा।
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कारण
- हिन्दी पट्टी के प्रतियोगी बदलाव के अनुरूप खुद को तैयार नहीं कर पा रहे। इससे इनकी क्षमता का सही मूल्यांकन नहीं हो पा रहा।
- मुख्य परीक्षा में जीएस के चार प्रश्नपत्रों में अभ्यर्थी की मौलिकता की परख होती है। जबकि, यहां अब भी पढ़ाई का परंपरागत तरीका चला आ रहा है।
- हिन्दी में स्तरीय तथा मूल रूप में पाठ्यसामग्री नहीं है। इसके विपरीत अंग्रेजी में बहुत सी किताबें हैं।
- ऐसे संस्थान नहीं हैं, जहां प्रतियोगी सभी विषयों की पढ़ाई कर सकें। हर विषय के लिए अलग-अलग संस्थान में भटकते हैं। इसमें समय और पैसा दोनों बर्बाद होता है।
- विश्वविद्यालय में पढ़ाई का गिरता स्तर और हॉस्टलों की अराजकता ने पूरा माहौल बिगाड़ दिया है।
- आईएएस, पीसीएस तथा अन्य भर्ती परीक्षा के प्रारूप में एकरूपता न होना भी बड़ा कारण है। हर परीक्षा के लिए अलग-अलग तैयारी करनी पड़ती है।
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