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Mahakumbh: 'एक थैला-एक थाली' अभियान के तहत जागरूकता जारी, आज भी जुड़े कई बुद्धजीवी
Mon, 10 Feb 2025 07:25 PM IST
आकाश दुबे
अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर
अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर
Published by: आकाश दुबे
Updated Mon, 10 Feb 2025 07:25 PM IST
सार
इस अभियान के तहत किसी श्रद्धालु के हाथ में पन्नी दिखी तो उसको थैला दे दिया जाता है। अभियान को चला रहीं शिप्रा पाठक कहा कि हमें अपनी संस्कृतियों को जीवित रखते हुए नदी को बचाना है।
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एनडीआरएफ के अधिकारियों को अभियान की जानकारी दी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
वॉटर वुमेन ऑफ इंडिया के नाम से जानी जाने वालीं शिप्रा पाठक महाकुंभ में जल और पर्यावरण संरक्षण के लिए 'एक थैला, एक थाली' अभियान में जुटीं हैं। अभियान के तहत अब तक विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से महाकुंभ में लाखों थैले और थालियों का वितरण किया जा चुका है। साथ ही इस अभियान के तहत वह पर्यावरण संरक्षण को लेकर लोगों को जागरूक कर रही हैं।
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शिप्रा का कहना है कि कुंभ को स्वच्छ बनाने के लिए हमने पहले ही अखाड़ों में जाकर थैला, थालियां, गिलास, चम्मच बांट दिए। किसी श्रद्धालु के हाथ में पन्नी दिखी तो उसको भी थैला दे दिया। उन्होंने कहा कि हमें अपनी संस्कृतियों को जीवित रखते हुए नदी को बचाना है। इसी क्रम में पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक गोपाल आर्या, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ अतुल कोठारी, हार्वर्ड विश्वविद्यालय अमेरिका से अपनी शिक्षा पूर्ण कर रहीं भारतीय मूल की सुरभि, एनडीआरएफ के अधिकारियों, पंजाब यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सुमन के अलावा सहायक सांख्यिकी अधिकारी पवन उनके शिविर में पहुंचे। इन लोगों को भी अभियान की जानकारी दी और इसके उद्देश्य से अवगत कराया।
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संस्कृति विलुप्त हुई तो दूसरा महाकुंभ नदी किनारे नहीं हो पाएगा
वॉटर विमेन शिप्रा पाठक जल एवं पर्यावरण संरक्षण को लेकर अब तक 13,000 किलोमीटर की पदयात्राएं कर चुकी हैं। उनकी संस्था पंचतत्व से 15 लाख लोग जुड़े हैं, जिनके सहयोग से नदियों के किनारे 25 लाख पौधे लगाए गए हैं। यहां महाकुंभ में भी वह स्वच्छता की अलख जगाने के लिए एक थैला, एक थाली अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। उनका कहना है कि कुंभ को स्वच्छ बनाने के लिए हमने पहले ही अखाड़ों में जाकर थैला, थालियां, गिलास, चम्मच बांट दिए। किसी श्रद्धालु के हाथ में पन्नी दिखी तो उसको भी थैला दे दिया। उन्होंने कहा कि हमें अपनी संस्कृतियों को जीवित रखते हुए नदी को बचाना है। नदियों को कमर्शियलाइज करके, मशीन डालकर साफ कर सकते हो, लेकिन संस्कृति यदि एक बार विलुप्त हो गई तो दूसरा महाकुंभ नदी किनारे नहीं हो पाएगा।
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