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अध्यात्म नहीं इंटरटेनमेंट तलाश रहे युवा
ब्यूरो/अमर उजाला इलाहाबाद
Updated Mon, 19 Jan 2015 01:15 AM IST
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इलाहाबाद(ब्यूरो)। संगम की रेती पर बसी तंबुओं की नगरी में देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालु अध्यात्म के रंग में डूबे हुए हैं। अनेक संगठनों से जुड़े तमाम युवा सेवा कार्य में अपनी खुशी तलाश रहे हैं लेकिन युवाओं का एक वर्ग ऐसा भी है, जो माघ मेले में सिर्फ और सिर्फ इंटरटेनमेंट तलाश रहा है। उनके लिए तो माघ मेला, फेवरेट पिकनिक स्पॉट बना हुआ है। रविवार को कई दिनों के बाद मौसम खुला तो युवाओं की भीड़ और बढ़ गई।
माघ मेले में शहरियों की भागीदारी में एक तिहाई संख्या युवाओं की है। माघ मेले में दोस्तों के साथ हंसी ठहाकों के बीच दिनभर मौज-मस्ती जारी है। घाटों के पास बैठने, टहलने और मेले में सजी तरह-तरह की दुकानों पर खरीदारी के अतिरिक्त छोटे-छोटे रेस्टोरेंट पर फास्ट फूड का लुत्फ भी लिया जा रहा है। इसके बीच ग्रुपफी (समूह में फोटो)खींचकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उन्हें अपलोड करना भी वे नहीं भूल रहे हैं।
फिलहाल पंडालों की गतिविधियों और माघ मेले की ‘सरस्वती’से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। किस पंडाल में क्या खास अनुष्ठान चल रहा है, इससे उन्हें कोई लेना देना नहीं है। मेले में मिल रही अध्यात्म की किताबों को देखने समझने, संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को जानने से भी उन्हें कोई मतलब नहीं है। ज्यादातर युवाओं ने सहज ही कहा, अभी से अध्यात्म को जानने-समझने की जरूरत ही क्या है। अध्यात्म की चौखट पर तो दस्तक पांच दशक बाद।
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माघ मेले में शहरियों की भागीदारी में एक तिहाई संख्या युवाओं की है। माघ मेले में दोस्तों के साथ हंसी ठहाकों के बीच दिनभर मौज-मस्ती जारी है। घाटों के पास बैठने, टहलने और मेले में सजी तरह-तरह की दुकानों पर खरीदारी के अतिरिक्त छोटे-छोटे रेस्टोरेंट पर फास्ट फूड का लुत्फ भी लिया जा रहा है। इसके बीच ग्रुपफी (समूह में फोटो)खींचकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उन्हें अपलोड करना भी वे नहीं भूल रहे हैं।
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फिलहाल पंडालों की गतिविधियों और माघ मेले की ‘सरस्वती’से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। किस पंडाल में क्या खास अनुष्ठान चल रहा है, इससे उन्हें कोई लेना देना नहीं है। मेले में मिल रही अध्यात्म की किताबों को देखने समझने, संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को जानने से भी उन्हें कोई मतलब नहीं है। ज्यादातर युवाओं ने सहज ही कहा, अभी से अध्यात्म को जानने-समझने की जरूरत ही क्या है। अध्यात्म की चौखट पर तो दस्तक पांच दशक बाद।
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