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High Court : यौन उत्पीड़न के आरोपी कुशीनगर के डीपीओ को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत
Fri, 30 May 2025 02:14 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 30 May 2025 02:14 AM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिला सहकर्मियों संग यौन उत्पीड़न के आरोप में निलंबित चल रहे कुशीनगर के जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) शैलेन्द्र कुमार राय को फिलहाल राहत देने से इन्कार कर दिया।
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अदालत का फैसला।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिला सहकर्मियों संग यौन उत्पीड़न के आरोप में निलंबित चल रहे कुशीनगर के जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) शैलेन्द्र कुमार राय को फिलहाल राहत देने से इन्कार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने उन्हें विभागीय अपील दाखिल करने के लिए चार हफ्ते की मोहलत दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार की अदालत ने दिया है।
याची के खिलाफ उनकी एक महिला सहकर्मी ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई है। आरोप लगाया है कि याची ने उन्हें मोटा कहा, साथ ही स्कूटी पर बैठने व साथ में बाहर घूमने का प्रस्ताव दिया। इस संबंध में शिकायत पर याची को निलंबित कर दिया गया और आंतरिक जांच शुरू की गई। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि पीड़िता की ओर से लगाए गए आरोप ''''मोटा'''' कह देना, स्कूटी पर बैठाने की पेशकश या घूमने के लिए कहना, यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 के तहत नहीं आते। उन्होंने समिति के गठन में कानूनी खामियां और जांच प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की बात भी उठाई।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी अधिकारी का आचरण न केवल अशोभनीय था, बल्कि महिला कर्मचारी के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाला था। यही नहीं एक अन्य महिला की ओर से भी आरोपी के खिलाफ शारीरिक उत्पीड़न और अश्लील टिप्पणी को लेकर दर्ज कराई गई एफआईआर को भी उन्होंने रेखांकित किया। इसके बाद कोर्ट ने निलंबन आदेश पर हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया। साथ ही याची की ओर से अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष दाखिल होने वाली अपील को दो महीने में तर्कसंगत आदेश संग निस्तारित करने का निर्देश दिया है।
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याची के खिलाफ उनकी एक महिला सहकर्मी ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई है। आरोप लगाया है कि याची ने उन्हें मोटा कहा, साथ ही स्कूटी पर बैठने व साथ में बाहर घूमने का प्रस्ताव दिया। इस संबंध में शिकायत पर याची को निलंबित कर दिया गया और आंतरिक जांच शुरू की गई। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि पीड़िता की ओर से लगाए गए आरोप ''''मोटा'''' कह देना, स्कूटी पर बैठाने की पेशकश या घूमने के लिए कहना, यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 के तहत नहीं आते। उन्होंने समिति के गठन में कानूनी खामियां और जांच प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की बात भी उठाई।
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वहीं, राज्य सरकार की ओर से मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी अधिकारी का आचरण न केवल अशोभनीय था, बल्कि महिला कर्मचारी के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाला था। यही नहीं एक अन्य महिला की ओर से भी आरोपी के खिलाफ शारीरिक उत्पीड़न और अश्लील टिप्पणी को लेकर दर्ज कराई गई एफआईआर को भी उन्होंने रेखांकित किया। इसके बाद कोर्ट ने निलंबन आदेश पर हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया। साथ ही याची की ओर से अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष दाखिल होने वाली अपील को दो महीने में तर्कसंगत आदेश संग निस्तारित करने का निर्देश दिया है।
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