1954 का भयावह कुंभ : पंडित नेहरू को देखने के लिए बेकाबू हुई भीड़, भगदड़ में एक हजार से अधिक लोगों की हुई मौत
आजादी के बाद पहले कुंभ की भीड़ में मची भगदड़ की डरावनी यादें आज भी बुजुर्गों को सताती हैं। तीन फरवरी 1954 के कुंभ शामिल होने वाले लोगों ने बताया कि भीड़ के पैरों तले दबकर हुई मौतों के बीच से जिंदा बच कर निकले लोग बदन पर बिना कपड़ों के ही...
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आजादी के बाद पहले कुंभ की भीड़ में मची भगदड़ की डरावनी यादें आज भी बुजुर्गों को सताती हैं। तीन फरवरी 1954 के कुंभ शामिल होने वाले लोगों ने बताया कि भीड़ के पैरों तले दबकर हुई मौतों के बीच से जिंदा बच कर निकले लोग बदन पर बिना कपड़ों के ही पैदल घर पहुंचे थे। कुछ ने वहां पड़े फटे-पुराने कपड़ों को लपेटा तो कुछ ने महुआ के पत्तों से तन ढका।
चायल तहसील के जवाहरगंज गांव निवासी तीर्थराज सिंह (87) बताते हैं कि देश की आजादी के बाद 1954 में प्रथम कुंभ मेला आयोजन किया गया था। मौनी अमावस्या पर संगम स्नान के लिए गांव के बड़े बुजुर्गो के साथ वह एक दिन पहले पैदल निकले थे। उस दौरान उनकी उम्र 16 साल थी। घर से भूना हुआ चना, लाई, गुड़, सत्तू की गठरी सिर पर लाद कर भोर में इलाहाबाद पहुंचे थे। भीड़ के रेले में वह सभी बड़ी जद्दोजहद के बाद रेत से भरी बोरियों के घाट तक पहुंच पाए थे।
पगड़ी, कुर्ता उतार संगम स्नान के बाद वह सभी बांध पार कर कहीं आराम से बैठ लाई चना चबाने की आपस में बात कर थे। तभी प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आने से भीड़ का रेला उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़ा और भगदड़ मच गई। श्रद्धालु जान बचाने के लिए इधर उधर भागने लगे। इस दौरान सिर से जमीन पर गिरी गठरी और भीड़ की रगड़ में खुल चुकी धोती को जिसने भी झुक कर उठाने का प्रयास किया। वह भीड़ के पैरों तले दबकर उठ नहीं सका।
बिना कपड़ों के भटकते रहे श्रद्धालु
धोती खुलने से लोग बिना कपड़ों के ही जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। गठरी का तो कहीं अता-पता ही नहीं था। किसी तरह वहां से भूखे-प्यासे बिना कपड़े के ही नंगे बदन वह पैदल घर के लिए निकल लिए थे। रास्ते में पड़े फटे-पुराने कपड़ों और महुआ के पत्तों को कमर पर लपेट कर घर पहुंचे। तीन दिन बाद रेडियो पर सुना कि कुंभ के भगदड़ में भीड़ के पैरों तले दब कर हजारों श्रद्धालुओं की मौत हो गई है।
भखंदा गांव निवासी पारसनाथ (90) भी 70 साल पहले मौनी अमावस्या पर नहाने संगम गए थे। उन्होंने बताया कि भगदड़ में वह साथियों से बिछड़ गए थे। तीन दिन बाद घर लौटे थे। इस दौरान परिजनों ने घर में खाना-पीना छोड़ दिया था। तीसरे दिन घर में लौटने पर परिजन को जान में जान आई थी।
बुजुर्गों की सलाह, कैबिनेट की बैठक से बचना चाहिए
तीर्थराज और पारसनाथ का कहना है कि प. नेहरू के देखने के चक्कर में ही 54 में भगदड़ मची थी। इस बार भी बताया जा रहा है कि सरकार महाकुंभ के दौरान कैबिनेट की बैठक करेगी। श्रद्धालुओं की सुरक्षा और होने वाली परेशानियों को ध्यान रखते हुए ऐसे आयोजनों से बचना चाहिए। यह धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। इसे राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए।