Kumbh 2019: पूर्ण कल्पवास की मान्यता वाले श्रद्धालु पूरा करेंगे संकल्प, ‘त्रिजपा’ के बाद लेंगे विदा
कुंभपर्व में संगम की रेती पर माघ माह में जप, तप, संयम, अनुशासन के साथ कल्पवास पूरा करने के बाद भले ही बड़ी संख्या में कल्पवासी तंबुओं की नगरी से रवाना हो गए हैं लेकिन ‘पूर्ण कल्पवास’ की मान्यता वाले कल्पवासी ‘त्रिजपा’ स्नान के बाद ही रेती से विदा लेंगे।इसे त्रुटि वश त्रिजटा स्नान भी कहते हैं। जिस प्रकार ‘तीर्थक्षेत्रे कृतं पापं बज्र लेपो भविष्यति’ यानी तीर्थक्षेत्र में किया गया पाप बज्रलेप की भांति कभी नहीं मिटता है, उसी प्रकार त्रिजपा स्नान के बाद ‘तीर्थक्षेत्रे कृतं पुण्यं बज्र लेपो भविष्यति’ यानी तीर्थक्षेत्र में किए गए पुण्य का बज्रलेप की भांति कभी भी क्षय नहीं होता है।
कल्पवासी ही नहीं बड़ी संख्या में संत भी त्रिजपा स्नान के बाद ही संगम की रेती से विदा लेंगे। मन्यता के अनुसार माघी पूर्णिमा पर स्नान से ही कल्पवास की समाप्ति नहीं होती क्योंकि पूर्णिमा को भी यम, नियम, संयम से कल्पवास जरूरी है। अब पूर्णिमा को रुके तो परेवा को स्थान छोड़ने की मान्यता नहीं है। वहीं प्रत्येक माह की द्वितीया की तिथि सर्वश्रेष्ठ और पुण्यकारी मानी जाती है। ऐसे में परेवा के बाद फाल्गुन की द्वितीया को ही, स्नानपर्व की दृष्टि से माह की पहली तिथि मानी जाएगी।
तीर्थपुरोहित आशुतोष ‘हरी मछली निशान’ के शिविर में कल्पवास कर रहे पंडित पीयूष कुमार मिश्र का कहना है कि त्रिजपा का शाब्दिक अर्थ तीन जप अर्थात तीन माह का जप है। इसके तहत पौष पूर्णिमा से कल्पवास की शुरुआत और माघ पूर्णिमा पर स्नान से दो माह की तिथियों पर तो डुबकी लग जाती है, पर तीसरे माह की तिथि पर स्नान के लिए फाल्गुन की द्वितीया तिथि पर स्नान की मान्यता है। ऐसे में बृहस्पतिवार को द्वितीया स्नान के साथ ही ‘त्रिजपा, त्रिजटा या त्रुटिजा’ की परंपरा और संकल्प पूरा होगा।
त्रुटि के निवारण को ही त्रिजपा
शंकराचार्य स्वामी अधोक्षजानंद देवतीर्थ कहते हैं, माघ में किए गए जप, तप, स्नान की परंपरा में हुई त्रुटि के निमित्त ही तीन तिथियों में अतिरिक्त स्नान की परंपरा है। त्रिजपा के माध्यम से उसी त्रुटि का निवारण है, जो जाने-अनजाने कल्पवास के दौरान संभव है। इसके बाद कल्पवास को पूर्णता मिलती है।