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प्रशासन को नहीं लगता कि सदमे में हैं किसान
ब्यूरो/अमर उजाला इलाहाबाद
Updated Wed, 29 Apr 2015 11:47 PM IST
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फसल बर्बादी के सदमे से जिले में किसानों की मौत का सिलसिला जारी है। एक किसान ने तो आत्महत्या भी कर ली लेकिन प्रशासन का रिकार्ड अब भी पूरी तरह से खाली है। भले ही प्रशासन ने इनमें से पांच पीड़ित परिवारों के मुख्यमंत्री राहत कोष से आर्थिक सहायता मुहैया कराने के लिए प्रस्ताव भेजा हो लेकिन अफसर यह मानने को तैयार नहीं हैं कि जिले में किसी भी किसान की मौत सदमे से हुई हो। यहां तक कि फूलपुर में फांसी लगाने वाले किसान की मौत के पीछे भी अफसर यही तर्क दे रहे हैं कि उसने घरेलू कलह के कारण जान दी।
मुख्यमंत्री दावा कर रहे हैं कि प्रदेश में फसल बर्बादी के सदमे से किसानों की मौत नहीं हुई। होगी भी कैसे, सरकार और शासन में बैठे अफसर जिस रिपोर्ट के आधार पर यह दावा कर रहे हैं, वह जिला स्तर से भेजी जाती है। इलाहाबाद की ही बात करें तो प्रशासनिक अफसरों के मुताबिक सदमे के कारण किसी किसान की मौत नहीं हुई। रिकार्ड बेहतर बना रहे, सो सरकारी रिपोर्ट के आधार पर ‘खेल’ जारी है और पीड़ित परिवारों को मदद की बात अब बेमानी साबित हो रही है।
जमीनी हकीकत की बात करें तो इलाहाबाद में अब तक तीन दर्जन से अधिक किसानों की मौत हो चुकी है। इनमें से आधे किसानों ने खेत में ही दम तोड़ दिया। उनकी मौत तब हुई, जब वे खेत में कटाई-मड़ाई करा रहे थे। किसानों की मौत के बाद परिजनों और गांव वालों ने भी यही बताया कि कम उपज देख किसानों को सदमा लगा, गश खाकर खेत में गिरे और मौके पर ही उनकी मौत हो गई।
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कुछ दिनों पहले फूलपुर तहसील में एक किसान ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। बताया गया कि वह खेत में मड़ाई करा रहा था। कम उपज देख हताश होकर घर लौटा और कमरे का दरवाजा बंद कर लिया। कुछ देर बार दरवाजा तोड़ा गया तो किसान फांसी के फंदे में झूल रहा था। प्रशासन ने इस मामले में किसान का पोस्टमार्टम भी कराया। साथ ही कुछ अन्य मामलों में भी सदम से मौत की बात सामने आने पर तीन किसानों के शव का पोस्टमार्टम कराया गया। एक मामले में तो कब्र से शव को निकालकर पोस्टमार्टम कराया गया लेकिन सरकारी दस्तावेजों में इस बात को सिरे से खारिज दिया गया कि किसी किसान की मौत सदमे के कारण हुई। प्रशासन मानने को तैयार ही नहीं कि किसानों की मौत सदमे की वजह से हुई। ऐसे में पीड़ित परिवारों को राहत कहां से मिलेगी।
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मुख्यमंत्री दावा कर रहे हैं कि प्रदेश में फसल बर्बादी के सदमे से किसानों की मौत नहीं हुई। होगी भी कैसे, सरकार और शासन में बैठे अफसर जिस रिपोर्ट के आधार पर यह दावा कर रहे हैं, वह जिला स्तर से भेजी जाती है। इलाहाबाद की ही बात करें तो प्रशासनिक अफसरों के मुताबिक सदमे के कारण किसी किसान की मौत नहीं हुई। रिकार्ड बेहतर बना रहे, सो सरकारी रिपोर्ट के आधार पर ‘खेल’ जारी है और पीड़ित परिवारों को मदद की बात अब बेमानी साबित हो रही है।
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जमीनी हकीकत की बात करें तो इलाहाबाद में अब तक तीन दर्जन से अधिक किसानों की मौत हो चुकी है। इनमें से आधे किसानों ने खेत में ही दम तोड़ दिया। उनकी मौत तब हुई, जब वे खेत में कटाई-मड़ाई करा रहे थे। किसानों की मौत के बाद परिजनों और गांव वालों ने भी यही बताया कि कम उपज देख किसानों को सदमा लगा, गश खाकर खेत में गिरे और मौके पर ही उनकी मौत हो गई।
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कुछ दिनों पहले फूलपुर तहसील में एक किसान ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। बताया गया कि वह खेत में मड़ाई करा रहा था। कम उपज देख हताश होकर घर लौटा और कमरे का दरवाजा बंद कर लिया। कुछ देर बार दरवाजा तोड़ा गया तो किसान फांसी के फंदे में झूल रहा था। प्रशासन ने इस मामले में किसान का पोस्टमार्टम भी कराया। साथ ही कुछ अन्य मामलों में भी सदम से मौत की बात सामने आने पर तीन किसानों के शव का पोस्टमार्टम कराया गया। एक मामले में तो कब्र से शव को निकालकर पोस्टमार्टम कराया गया लेकिन सरकारी दस्तावेजों में इस बात को सिरे से खारिज दिया गया कि किसी किसान की मौत सदमे के कारण हुई। प्रशासन मानने को तैयार ही नहीं कि किसानों की मौत सदमे की वजह से हुई। ऐसे में पीड़ित परिवारों को राहत कहां से मिलेगी।