लॉकडाउन की वजह से अबकी हजरत अली की शहादत पर मनाए जाने वाले तीन दिवसीय गम के पहले दिन बुधवार को 19 वीं रमजान का जुलूस ‘सुबहे ज़रबत मौला अली’ नहीं निकाला गया। साथ ही मस्जिद काजी साहब बख्शी बाजार में फजिर की नमाज के बाद होने वाली मजलिस नहीं हुई। बस, इमामबाड़े में ताबूत हजरत अली को सजा कर रखा गया। रानीमंडी की धोबी गली से 1836 में मीर मोहम्मद इस्माइल उर्फ मद्दन मियां ने जुलूस निकालने का सिलसिला शुरू किया गया था। उलेमा के मुताबिक 1401 बरस पहले उन्नीसवीं रमजान को ही मस्जिदे कूफा में सजदे के वक्त हजरत अली पर अब्दुर्रहमान इब्ने मुल्जिम नामक कातिल ने जहर बुझी तलवार से वार कर दिया था। बाद में 21 रमजान को वह शहीद हो गए थे। असर फाउंडेशन के अध्यक्ष शौकत भारती कहते हैं, यह इस्लामी तारीख में किसी मस्जिद में होने वाला पहला हमला था।
लॉकडाउन का पालन करते हुए अबकी आधा दर्जन जुलूस नहीं निकले, न ही मजलिसें हुईं। घरों मे रहकर काला लिबास पहन कर ‘या अली मौला हैदर मौला’ की सदाएं गूंजीं। महिलाओं ने चूड़ियां तोड़ कर गम मनाया। इफ्तारी में भी कोई खास पकवान नहीं बनाए गए। सादगी से रोजा इफ्तार किया गया। ऑनलाइन नौहों से गमे हजरत अली मनाया गया। अन्जुमन गुंजचाए कासिमिया के प्रवक्ता सैयद मोहम्मद अस्करी के मुताबिक करेली जेके आशियाना में मस्जिद वजीह हसन से उठकर मौलाना शम्सी के आवास तक गश्त करने वाला जुलूस भी नहीं उठा। इसकी जगह शैदा रिजवी के संचालन में ऑनलाइन मजलिस हुई। दरियाबाद स्थित इमामबाड़ा मोजिजनुमा से जुलूस न निकाल कर नजीब इलाहाबादी के संचालन में ऑनलाइन मजलिस हुई। जिक्रे मासूमीन ग्रुप पर भी ऑनलाइन मजलिस हुई। वहीं सिर्फ परिजनों की मौजूदगी में दायराशाह अजमल स्थित डॉ.मुस्तफा के आहाते में शबीहे ताबूत मौला अली निकालकर ‘सुबहे ज़रबत मौला अली’ का गम मनाया गया।