हाईकोर्ट ने कहा : प्रमाण पत्र देने में सीएमओ की चूक के लिए स्टाफ नर्स का चयन रोकना अनुचित
हाईकोर्ट की दो जजों की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि सीएमओ रामपुर ने प्रमाण पत्र में गलती की और इसे स्वीकार भी किया है। इस आधार पर स्टाफ नर्स का चयन रोकना अनुचित है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्टाफ नर्स भर्ती मामले में गलत अनुभव प्रमाण पत्र को लेकर चयन निरस्त करने संबंधी उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी है। दो जजों की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि सीएमओ रामपुर ने प्रमाण पत्र में गलती की और इसे स्वीकार भी किया है। इस आधार पर स्टाफ नर्स का चयन रोकना अनुचित है।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता व न्यायमूर्ति डी रमेश की खंडपीठ के फैसले से मुरादाबाद की रेनू व अन्य को बड़ी राहत मिली है। इनके खिलाफ उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) ने विशेष अनुमति याचिका दाखिल की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा, प्रदेश में स्टाफ नर्स के 1729 पद खाली पड़े हैं, क्योंकि योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहे। याचीगण ने लिखित परीक्षा पास की है। स्टाफ नर्स के बतौर काम का अनुभव भी है।
इनके चयन से किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके उलट स्वास्थ्य विभाग को ही कुछ मदद मिलेगी। स्टाफ नर्स के लिए यूपीपीएससी ने 2021 में विज्ञापन निकाला था। इसमें स्टाफ नर्स के रूप में काम का अनुभव रखने वाले उम्मीदवारों को तीन अंक प्रति वर्ष की दर से अधिकतम 15 अंक दिए जाने थे। इसके लिए सक्षम अधिकारी की ओर से जारी प्रमाणपत्र ही मान्य था।
रेनू व अन्य ने फॉर्म भरने के दैारान जो अनुभव प्रमाण पत्र लगाया, उसमें स्टाफ नर्स की जगह नर्स मेंटर दर्ज था। मुख्य चिकित्सा अधिकारी, रामपुर ने इसे अपनी चूक मानते हुए दूसरा प्रमाणपत्र जारी किया। याचीगण ने इसी आधार पर 5 सितंबर 2022 को आयोग से चयनित घोषित करने की प्रार्थना की, लेकिन आयोग ने इसे नहीं माना।
रेनू और अन्य ने हाईकोर्ट की शरण ली, जिसमें एकल पीठ ने उनके हक में फैसला दिया। इसके खिलाफ यूपीपीएससी ने अपील की। कहा, निर्धारित तिथि के बाद अनुभव प्रमाण पत्र दिया गया है, जिसके आधार पर चयन नहीं किया जा सकता। विपक्षीगण के अधिवक्ता ने कहा, यह निर्धारित तिथि के बाद प्रमाण पत्र दाखिल करने का नहीं, बल्कि प्रमाण पत्र में त्रुटि सुधार का मामला है।