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High Court : विसंगतियों पर हस्तक्षेप से अदालत को नहीं रोक सकती चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत, एकल पीठ का आदेश रद्द

Sat, 18 Apr 2026 06:24 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 18 Apr 2026 06:24 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत अदालत को चुनाव की विसंगतियों पर विचार करने से रोकने का आधार नहीं है। यदि मतदाता सूची पर किसी सक्षम प्राधिकारी ने पहले से रोक लगा रखी है तो इन तथ्यों को अदालत नजरअंदाज नहीं कर सकती।

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Intervention on discrepancies cannot prevent the court from stopping the election process, single bench order
कोर्ट का आदेश। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत अदालत को चुनाव की विसंगतियों पर विचार करने से रोकने का आधार नहीं है। यदि मतदाता सूची पर किसी सक्षम प्राधिकारी ने पहले से रोक लगा रखी है तो इन तथ्यों को अदालत नजरअंदाज नहीं कर सकती।

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इस टिप्पणी के साथ मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने महेंद्र सिंह व अन्य और श्री अनंत आदर्श शिक्षा परिषद देवरिया की ओर से एकल पीठ के आदेश को चुनौती देने वाली विशेष अपीलों को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने एकल पीठ के आदेश को रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से गुणदोष के आधार पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है।
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मामला देवरिया स्थित विद्यालय की प्रबंध समिति के चुनाव से जुड़ा है। इसकी मतदाता सूची को लेकर हुए विवाद के खिलाफ याचियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि सहायक रजिस्ट्रार ने उनकी आपत्तियों को सुने बिना एकपक्षीय सूची जारी की और चुनाव अधिकारी नियुक्त कर दिया।
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एकल पीठ ने 25 मार्च 2026 को इन याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, इसलिए हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा और नई समिति को कार्यभार सौंपने का निर्देश दे दिया था। एकल पीठ के आदेश को अपीलकर्ताओं ने खंडपीठ में चुनौती दी। खंडपीठ ने विशेष अपील स्वीकार करते हुए पाया कि याचिका पर सुनवाई से ठीक एक सप्ताह पहले 18 मार्च 2026 को उप-विभागीय अधिकारी ने सहायक रजिस्ट्रार के आदेशों पर रोक लगा दी थी।


कोर्ट ने कहा कि एक बार जब एकल पीठ ने चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था तो निर्वाचित समिति को कार्यभार सौंपने का निर्देश देने का कोई औचित्य नहीं था। विवादित आदेशों की वैधानिकता की जांच तथ्यों और कानून के आधार पर की जानी आवश्यक है।

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