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मांगने के बजाए खुद के संसाधन जुटाए नगर निगम

Thu, 02 Jun 2016 01:15 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Thu, 02 Jun 2016 01:15 AM IST
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Instead of asking yourself municipal resource mobilization
कोर्ट - फोटो : demo photo
इलाहाबाद नगर निगम की आर्थिक तंगी पर हाईकोर्ट ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि नगर निगम जैसे स्थानीय निकाय सिर्फ सरकारी अनुदान के भरोसे नहीं रह सकते हैं। आज के समय में जब खुद सरकारें अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं और सीमित दायरे में काम कर रही हैं तो निगमों को खुद के संसाधन जुटाने चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई है कि शहर की तमाम सरकारी संस्थाओं पर ही निगम का 31 करोड़ रुपये से अधिक बकाया है। इसे वसूल करने के बजाए दैनिक वेतन भोगियों को वेतन देने केलिए निगम सरकार का मुंह देख रहे हैं। कोर्ट ने नगर निगम और प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह संस्थानों से यूजर चार्ज वसूल करने के लिए सभी वैधानिक कदम उठाएं।
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अशोक कुमार की जनहित याचिका के जरिए शहर में साफ-सफाई व्यवस्था, पर्यावरण प्रदूषण आदि की मॉनिटरिंग कर रही जस्टिस दिलीप गुप्ता और जस्टिस यशवंत वर्मा की पीठ ने नगर आयुक्त को निर्देश दिया है कि वह यूजर चार्ज वसूल करने के लिए सभी कानूनी कदम उठाएं। नगर निगम के हलफनामे में बताया गया कि शहर की 28 सरकारी संस्थाओं पर यूजर चार्ज का 31 करोड़, 85 लाख, 70 हजार 426 रुपये बकाया हैं। इसमें अकेले रेलवे पर दो करोड़ 96 लाख रुपये बकाया है। रकम वसूलने के लिए निगम ने नोटिस भेजने के अलावा कोई दूसरा कदम नहीं उठाया है।
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नगर निगम के बजट में कटौती के मुद्दे पर कोर्ट ने प्रमुख सचिव वित्त और प्रमुख सचिव नगर विकास के साथ नगर आयुक्त और आयुक्त इलाहाबाद को बैठक कर वेतन सहित अन्य वित्तीय मुद्दों का हल निकालने का निर्देश दिया है। नगर निगम का कहना है कि उसे प्रतिमाह 12.17 करोड़ रुपये बजट की आवश्यकता है जबकि सरकार से मात्र 8.40 करोड़ रुपये ही मिल रहे हैं। बजट की कमी से संविदा पर रखे गए कर्मियों को वेतन का भुगतान नहीं हो पा रहा है।
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शहर के हालात का निरीक्षण करते हुए कोर्ट ने पाया कि शहर के अनियोजित विकास से सुविधाओं का संतुलन बिगड़ गया है। हाल के दिनों में आवासीय क्षेत्रों का तेजी से व्यावसायिक क्षेत्र में परिवर्तन हुआ है। बिना म्युनिस्पल सुविधाओं और संसाधनों का ध्यान रखे बहुमंजिला आवासीय इमारतों के निर्माण की स्वीकृत दिए जाने से विकास के अनुरूप नागरिक सुविधाएं नहीं मुहैया कराई जा सकी हैं। कोर्ट ने इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष से विस्तृत हलफनामा दाखिल कर बताने को कहा है कि व्यावसायिक भवनों और बहुमंजिला इमारतों को बनाने की अनुमति देते समय उनके निर्माण से म्युनिस्पल सुविधाओं पर पड़ने वाले बोझ कर कोई अध्ययन किया गया अथवा नहीं। कोर्ट ने एडीए से पिछले चार मस्टर प्लान का ब्यौरा भी मांगा है।
प्रदूषण पर डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट से कोर्ट गंभीर

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इलाहाबाद के प्रदूषण पर दी गई रिपोर्ट को अदालत ने गंभीरता से लिया है। न्यायमित्र ने अदालत को बताया कि डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार इलाहाबाद में दिल्ली से भी अधिक वायु प्रदूषण है। इसकी वजह अनियोजित विकास और हरे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई है। शहर में बढ़ते ट्रैफिक और डीजल वाहनों की वजह से वायु प्रदूषण बढ़ा है, जिसका असर आम आदमी के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

कोर्ट ने इसे बेहद गंभीरता से लेते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया है कि वह शहर के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग वायु प्रदूषण के स्तर की जांच कर दो सप्ताह में रिपोर्ट दे। क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी से डीजल से चलने वाले आटो रिक्शा और बसों की जानकारी मांगी है। कोर्ट ने परिवहन अधिकारी, नगर आयुक्त और कमिश्नर को संयुक्त बैठक कर सीएनजी से टैक्सी और बसों के संचालन की संभावना तलाशने और रिपोर्ट तैयार करने को कहा है। सड़क पर चलने की समय सीमा पार कर चुके वाहनों को हटाने के लिए दूरगामी योजना तैयार करने का निर्देश दिया है।


हाईकोर्ट ने कहा है कि ऐसे रेस्टोरेंट, दुकानों, शराब की दुकानों और वाहन मरम्मत करने वाली दुकानों को बंद कर दिया जाए जिनके पास पार्किंग की सुविधा नहीं है। यह दुकानें रोड पटरियों पर अतिक्रमण के लिए जिम्मेदार हैं। शहर में अनियमित पार्किंग पर कोर्ट ने एसएसपी और एसपी यातायात को अगली सुनवाई पर तलब किया है। अवैध पार्किंग पर अधिकारियों को कड़ी कार्रवाई का निर्देश दिया है। कोर्ट एडीए वीसी से भी ऐसे प्रतिष्ठानों की सूची मांगी है जिनके पास पार्किंग सुविधा नहीं है। कोर्ट ने पटरी दुकानदारों के संरक्षण के लिए स्ट्रीट वेंडिंग कमेटी के गठन का निर्देश दिया है। 
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