फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Imposing a major penalty without oral hearing and examination of witnesses is legally wrong, order to demote

High Court:मौखिक सुनवाई व गवाहों के परीक्षण के बिना बड़ा दंड देना कानूनन गलत, जेई को पदावनति करने का आदेश रद्द

Sat, 18 Apr 2026 03:31 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 18 Apr 2026 03:31 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को बिना उचित मौखिक सुनवाई और गवाहों के परीक्षण के बड़ा दंड देना कानूनन गलत है।

विज्ञापन
Imposing a major penalty without oral hearing and examination of witnesses is legally wrong, order to demote
अदालत। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को बिना उचित मौखिक सुनवाई और गवाहों के परीक्षण के बड़ा दंड देना कानूनन गलत है। कोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच के दौरान उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

विज्ञापन


इसके साथ ही कोर्ट ने बांदा विकास प्राधिकरण में कार्यरत रहे जूनियर इंजीनियर सत्येंद्र सिंह के खिलाफ पारित पदावनति के दंड आदेश को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने दिया है। याचिकाकर्ता सत्येंद्र सिंह को कर्तव्यों के प्रति लापरवाही बरतने और अवैध निर्माणों को रोकने में विफल रहने के आरोप में नौ फरवरी 2024 के आदेश से पदावनति कर दिया गया था। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि जांच अधिकारी ने किसी भी गवाह का परीक्षण नहीं किया और न ही याची को अपनी बात रखने के लिए मौखिक सुनवाई का अवसर प्रदान किया।
विज्ञापन


हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट के सत्येंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024) और रूप सिंह नेगी जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब किसी कर्मचारी को बड़ा दंड देने का प्रस्ताव हो तो केवल दस्तावेजों के आधार पर दोषसिद्ध करना पर्याप्त नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन


कहा कि विभागीय जांच एक अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया है, जिसमें जांच अधिकारी को गवाहों के माध्यम से आरोपों को साबित करना अनिवार्य है। इस मामले में हालांकि मौखिक सुनवाई के लिए एक तिथि तय की गई थी, लेकिन उस दिन केवल लिखित जवाब लेकर औपचारिकता पूरी कर ली गई, जिसे अदालत ने अपर्याप्त माना।

अदालत ने दंड आदेश को रद्द करते हुए मामले को उस चरण से दोबारा शुरू करने की अनुमति दी है, जहां से प्रक्रियात्मक त्रुटि हुई थी। चूंकि, याचिकाकर्ता इस दौरान सेवानिवृत्त हो चुका है, इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया है कि उसकी पेंशन और अन्य लाभों पर ताजा कार्यवाही के परिणाम के आधार पर निर्णय लिया जाए।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed